● Life की परछाई ●
By AnAlone Krishna
Chapter 10
(इस chapter में Individuality को अलग-अलग perspectives से समझाने की कोशिश की गई है। इसे पढ़ें और अपनी प्रतिक्रिया दें। अगर आपको अपना भी नज़रिया share करने का मन करे तो आप comment कर सकते हो।)
Prelude | Chapter 1 | 2 | 3 | 4 | 5 | 6 | 7 | 8 | 9 | 10 | 11 | 12
Life की परछाई
Chapter 10 : Perspectives on Individuality (इस chapter को इसके लंबे length के कारण कई parts में divide किया गया है।)
10.2 : Individuality of Personal Choices
10.3 : Individuality of Personal Role
10.5 : Individuality of Personal Freedom
● Life की परछाई ●
Chapter 10.4 : Individuality of Personal Identity
जब hospital में अभिषा अपने पिता से मिलने आई थी, तो वह अकेले नहीं थी। उसके साथ उदय और उनके कुछ friends भी थे। अभिषा का भाई आशुतोष जब अभिषा को शादी के जोड़े में देखा, और साथ में उदय को खड़ा देखा, तो उसका खून उबलने लगा। देख कर ऐसा लग रहा था कि अभी अब वह जाकर उदय को पीट देगा। पर उस वक्त अभिषा के मामा, जो उस वक़्त तक वहाँ पहुँच चुके थे। वो आशुतोष के कंधे पर हाँथ रखें। आशुतोष अपने मामा को देखा, वो उसे शांत रहने का इशारा कर रहे थे। इसके दो कारण थे- पहला यह कि वो hospital में थे, और दूसरा यह कि उदय अकेले नहीं था। वहां पर अभिषा और उदय के friends भी थे।
अभिषा ward से बाहर आकर bench में बैठी। थोड़ी देर बाद जब आशुतोष bench के बगल से गुजर रहा था, तो अभिषा अपने भाई आशुतोष के हाँथ को पकड़ कर खींची। जिससे झटके से आशुतोष bench में बैठ गया। वह अभिषा को गुस्से से देखा और फिर उसे बिना कुछ कहे उठने जा रहा था, कि अभिषा उसके हाँथ को फिर से खींची, और आशुतोष दोबारा बैठ गया। वह पहले तो अभिषा को गुस्से से घूरा, पर उसे वह कुछ नहीं बोला। फिर आशुतोष अभिषा से नज़र फेरकर सामने देखते हुए बगल में बैठी अभिषा से कहा, "मुझे तुमसे ऐसी उम्मीद नहीं थी।"
अभिषा बोली, "तुम यह बात मुझे पहले भी बोल चुके हो।"
आशुतोष अभिषा की ओर देखा, आशुतोष की आँखें उस वक़्त ऐसी थी कि मानो उसके आँखों में आँसू डबडबा जायेंगे। वह अभिषा से फिर से आँखें फेर लिया और बोला, "मुझे लगा था कि तुम ऐसा कुछ कभी नहीं करोगी।"
अभिषा पूछी, "क्या ?"
आशुतोष बोला, "सलोनी दी की तरह घर से भागना।"
अभिषा आशुतोष के गाल में धीरे से मगर गुस्से से एक थप्पड़ मारी। उसे अपने भाई की care थी, इसलिए उसका instinct उसे थप्पड़ मारने से रोक रहा था। पर वह अपनी सहेली को अपनी बहन जैसी मानती थी, और उसके बारे में कुछ गलत सुन भी नहीं सकती थी। इसलिए वह आशुतोष को थप्पड़ मारने से खुद को रोक भी नहीं पाई। इसलिए उसका थप्पड़ गुस्से से था, पर धीरे ही था। वह आशुतोष को थप्पड़ मारने के बाद उसे बोली, "सलोनी भागी नहीं थी। उसकी माँ उसे बिना बताएं घर में मेहमान बुलाकर उसे college जाने से रोक रही थी। वह बस college गई थी अपना exam form भरने।"
आशुतोष आगे बोला, "तो तुम क्यों घर से भागी ? हमलोग कौन सा तुम्हारे ऊपर जबरदस्ती कर रहे थे ?"
अभिषा अपने भाई के कंधे पर हाँथ रखी और बोली, "मैं क्या करती ? तुम्हारे हिसाब से मुझे क्या करना चाहिए था?"
आशुतोष बोला, "सलोनी दी को लेकर ऐसा कुछ expected था। उनके पास घर से भागने के अलावा कोई choice नहीं था।"
इतना सुनते ही गुस्से में अभिषा फिर से अपना हाँथ उठा लेती है, पर आशुतोष आगे बोलता है, "पर आपको भागने की क्या जरूरत थी? आपकी तो हर बात घर में मानी जाती है।" और यह सुनकर अभिषा अपना हाँथ हवा में ही रोक लेती है।
वह हाँथ का मुट्ठी बाँधती है और आशुतोष का पीठ को थपथपाते हुए बोलती है, "तुम्हें ऐसा क्यूँ लगता है कि सलोनी अपने घर से भाग सकती है?"
आशुतोष बोलता है, "कई कारण हैं- उसकी family उसका कहा कभी नहीं सुनती है, वो modern है और उसकी family orthodox, past से ही वो हर वो सब करते आई है जो family और समाज दोनों को नापसंद हो। पर तुम्हारे साथ तो ये सब condition नहीं था।"
अभिषा बोलती है, "तो तुम उसके और मेरे character को हमारे environment से judge कर रहे हो? हमारा हमारे समाज के अलावा कोई identity नहीं है? अच्छा की कि मैं घर से भागी, वरना मेरी पहचान हमेशा मेरी family identity ही रह जाती।"
अशुशोष को कुछ समझ नहीं आता है। वह अभिषा को घूरता है। अभिषा आशुतोष के भाव को देखकर समझ जाती है कि वह कुछ नहीं समझा। इसलिए वह पूछती है, "लोग कैसे होंगे, वो क्या कर सकते हैं, क्या तुम इसे इस बात से तय करते हो कि वो कैसे समाज से आते है ?"
आशुतोष बोलता है, "वो जैसे जगह में रहेंगे, जो सब सीखेंगे, वो वही ना बनेंगे और करेंगे..!"
अभिषा पूछती है, "क्या कोई सिर्फ अपने परिवार और समाज से ही सीखता है, और कहीं का प्रभाव उसपर नहीं पड़ता है?"
आशुतोष बोलता है, "पड़ता ही है, कि वह कैसे संगत में रहता है, वह किनके साथ उठता-बैठता है।"
अभिषा बोली, "सलोनी मेरी friend है, वह मेरे साथ रहती है। उसके और मेरे, सभी common friends है। बचपन से मैं जहां पढ़ी हूँ, वो भी वहाँ ही पढ़ी है। हम साथ में school और college जाते थे। फिर तुम उसके बारे में ऐसा कैसे बोल दिया कि वह घर से भाग सकती है, और मुझसे तुम्हें ऐसी कोई उम्मीद नहीं थी?"
आशुतोष अभिषा को घूरता है, "अब समझ में आया। तुमपर उसी के संगत का असर है।"
यह सुनकर अभिषा फिर से आशुतोष को एक थप्पड़ मारती है। पर इस बार पहले की तरह थप्पड़ धीरे नहीं था, बल्कि उससे थोड़ा तेज था। यह देखकर उदय सामने आ गया, यह देखने कि क्या हो गया। अभिषा बोली, "मेरी जगह अगर वो होती तो वह कभी नहीं भागती। तुम्हारी सोंच भी औरों की तरह बँधी हुई है। तुम किसी के Individual identity को नहीं समझते हो। तुम लोगों के common social identity के आधार पर सभी को मानते हो।"
आशुतोष अभिषा को घूरता है, और सामने खड़े उदय को गुस्से से देखता है। अभिषा आगे कहती है, "किसका background क्या है, उसके आधार पर लोगों को judge मत करो। इससे तुम अक्सर धोखा खाओगे। कौन क्या पढ़ता है, उसकी सोंच कैसे develop होती है, इससे इंसान का individual identity उसके social identity से बदल जाता है। हर इंसान वैसा नहीं होता है जैसा उसका समाज होता है।"
आशुतोष उदय को घूरते हुए बोलता है, "चलो मैं मान लिया कि तुम्हारा यह पसंद अपने समाज से अलग है। पर मैं इसके समाज को नहीं जानता हूँ। फिर तो मैं सिर्फ इसको देखकर ना इसके बारे में अपना राय बना रहा हूँ।"
यह सुनकर उदय मुस्कुराता है, और बोलता है, "क्या हम आपस में कभी किसी topic पर बात किए? क्या तुम मेरे लिखे किसी articles को पढ़े हो? मैं तुम्हारे सामने खुद को कब और कैसे express किया हूँ, जिसके आधार पर तुम मेरे बारे में अपना कोई राय बना सको?"
आशुतोष इसका कोई जवाब नहीं दे पाता है। उदय आगे सवाल करता है, "क्या इसका मतलब यह नहीं कि तुम्हारे दिमाग में पहले से ही किसी खास छवि को लेकर कोई धारणा बनी हुई है जिसमें तुम मुझे गिन रहे हो ? मेरे individual identity को बिना जाने और समझे तुम मेरे बारे में अपना कोई राय कैसे बना सकते हो ?"
इस बार आशुतोष को upper hand मिला और वह मुस्कुरा कर बोला, "मैं ऐसा क्या तुम्हारे बारे में बोला या किया हूँ जिससे तुम्हें ऐसा लग रहा है कि मैं तुम्हे बिना जाने-समझे judge कर रहा हूँ? क्या इस तरह तुम खुद मुझे बिना जाने समझे judge नहींं कर रहे हो कि मैं किस नज़र से लोगों को देखता हूँ?"
आशुतोष अभिषा की ओर मुड़कर अभिषा को देखते हुए बोलता है, "मैं फिर से तुमसे यह पूछता हूँ कि, तुम्हें घर से भागने की क्या जरूरत थी? तुम घर में सभी को मना भी तो सकती थी।"
इसपर अभिषा सिर्फ इतना बोली, "घरवालों को मनाने का फायदा तब होता जब दोनों के घरवाले मानते। सिर्फ अगर मेरे घरवाले मानते तो बाद में इनपर यह इल्जाम लगता कि ये पैसे देखकर इन्हें (उदय की ओर इशारा करते हुए) फंसाए है। मेरे भागने से अब दोनों family को लोग victim मानेंगे और हम दोनों को culprit मानेंगे। इससे इसके आगे जो होगा, हम उसे झेलेंगे। समाज हमारी family को वैसे परेशान नहीं करेगा जैसे वो अपने बच्चों के love को accept करने वाले बाकी families को परेशान करता है।"
आशुतोष बोलता है, "तुम पागल हो।"
अभिषा यह सुनकर अपना दाँत दिखाई।
आशुतोष उदय को देखकर बोला, "तुम्हें मेरी यह पागल बहन पसंद कैसे आ गई?"
उदय बोला, "हमारी सोंच आपस में मिलती है।"
आशुतोष बोला, "तुम दोनों ही पागल हो।" और वह वहां से उठकर चला गया।
आशुतोष के जाने के बाद उदय अभिषा से पूछता है, "तुम्हारे भाई का अभी उम्र क्या होगा?"
अभिषा बताती है, "18 साल। Voter ID का कुछ दिन पहले form भरा है।"
उदय पूछता है, "तुम अपने भाई से कुछ ज्यादा ही maturity की उम्मीद नहीं कर रही हो?"
अभिषा जवाब देती है, "अभी भले समझ में ना आए। पर यही बहाने कम से कम उसको इसके बारे में समझने को तो मिलेगा।"
उदय bench में बैठते हुए बोला, "यह इतना आसान नहीं है।" वह अभिषा के कंधे पर हाँथ रखा और बोला, "लोग यह बात नहीं समझते हैं कि-
• किसी का व्यवहार उसके समाज से अलग हो सकता है,
• कोई अपने परिवार से अलग पहचान बनाने की कोशिश कर सकता है,
• कोई अपने पिता के बजाए अपना खुद का नाम बनाने की कोशिश कर सकता है,
• कोई किसी peer group में होकर अपने बाकी दोस्तों से अलग सोंच रख सकता है,...
लोगों के पास multiple examples होते हैं। फिर भी लोग लोगों के personal and individual identity को नहीं समझते हैं और सभी को एक ही तराजू में तौलते हैं। अगर हर किसी को Individuality समझ में आता, तो वो एक दूसरे को बेहतर तरीके से समझ पाते।"
अभिषा कहती है, "जब मैं छोटी थी, school में जो सीख कर आती थी उसे घर और अपने life में apply करने की कोशिश करती थी। घरवाले इस चीज को देखकर हँसते थे। मेरे घर में मुझे उस तरह से रोका-टोका नहीं गया जैसे बाकी disciplined में रखने वाली families करती है। जिसके वजह से वैसे घरों के हर बच्चे लगभग एक जैसे ही होते हैं। मेरी family और समाज का गुण है कि वहां youngsters के सवालों को welcome किया जाता है। जिससे हम सभी multi-character show करते हैं, हमें एक धारा में गिना नहीं जा सकता है। जैसे-जैसे मैं बड़ी हुई, मेरे ऊपर माहौल का प्रभाव पड़ना कम हो गया। मैं जो चीजें किताबों में पढ़ती थी, उससे मेरा जो नजरियां बना, मैं हर एक चीज खुद से decide करती थी कि मुझे क्या सही या गलत लगता है। मुझे क्या चुनना है और क्या छोड़ना है। मैं क्या बनना चाहती हूँ, और मुझे कैसा होना चाहिए। मैं समाज की सोंच, परिवार के आदर्श, के साथ दोस्तों के नजरिए से भी अलग हो चुकी हूँ, कई मामले में। मुझपर अब मेरे environment का प्रभाव नहीं पड़ता है बल्कि मैं अपने according अपने माहौल को बदलने की कोशिश करती हूँ। मेरे भाई को भी लगता है कि मैं सलोनी के संगत में रहकर घर से भागी हूँ। जबकि असलियत यह है कि सलोनी मेरे साथ रहने की वजह से बागी(rebellious) है। वो कब का अपना हिम्मत हार चुकी थी। वह hopeless थी। उसके अन्दर दोबारा hope जगाने के लिए मुझे उसके लिए कई चीज करना पड़ा। आज भी वह hope तो रखती है, पर वह अपने family के against नहीं जा पाती है। यही वजह है उससे वो गलती हुई, वह खुद को express करने से पहले वह step ले ली। उसे अपनी family को face करने से ज्यादा आसान उससे भागना लगा। पर अगर मैं खुद की बात करूं तो मैं समाज, परिवार, peer group, या किसी किताब की परछाई नहीं हूँ। बल्कि मैं वो हूँ, जो मैं होना चुनी हूँ, जो मैं बनना चुनी हूँ। मेरी परछाई, मेरा अक्स उनसे अलग है। यह मेरी खुद की individual हैं।"
उदय मुस्कुराता है और उसे अपनी ओर खींचते हुए बोलता है, "इसलिए तुम मुझे पसंद हो। इसलिए मैं तुम्हारे साथ होना चुना हूँ।"
अभिषा उदय का हाँथ पकड़ती है और बोलती है, "तो, अब कहां जाओगे?"
उदय कहता है, "जहाँ जाऊँगा, तुम्हें साथ लेकर जाऊँगा। तुम्हें पीछे अकेले छोड़कर थोड़ी जाऊँगा। तुम्हें कहाँ जाने का मन है?"
अभिषा कहती है, "अभी इस घर के लोगों के पास आ ही गए हैं तो पहले इन्हें ही मनाने की कोशिश करते है।"
उदय अभिषा का बात मान जाता है और फिर अभिषा की family के साथ अभिषा के अब मायके और अपना नव-नवेला ससुराल चला जाता है। इसके बाद के glimpse तो आप album के snapshots से पहले ही जान चुके हो।
(Ref. Chapter 7,8,9)
-----Chapter partitioned due to its large length.
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Life की परछाई
Chapter 10 : Perspectives on Individuality (Content काफी लंबा होने के कारण इस chapter को parts में divide किया गया है। Comment में बताए कि यह आपको कैसा लगा। )
10.4 : Individuality of Personal Identity
10.5 : Individuality of Personal Freedom
Story by -AnAlone Krishna.
Published on 8th August, 2026 A.D.
Published on 8th August, 2026 A.D.
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