I, Krishna, present you here, my 100+ literary works—poems and stories. I hope, I shall plunder your heart by these. Let you dive into my imaginary world. I request you humbly to give your precious reviews/comments on what you read and please share it with your loved ones to support my works.

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Day 92 : The Mud Clod, Resilient Stone and Alum Cristal | Diary of AnAlone Krishna

अपने यह कभी ना कभी गौर किया होगा कि-

• अगर आप मिट्टी के ढेले को पानी में फेंकोगे तो वह धीरे धीरे पानी में घुलकर अपना अस्तित्व खो देता है। अगर स्थिर पानी हो तो समय लगता है, पर अस्थिर पानी हो तो जल्दी घुल जाता है। 
 उस मिट्टी के ढ़ेले की तरह अगर किसी का किरदार दूसरों के thoughts and perspectives से बना होता है तो वह समाज और समय के प्रभाव से एक वक्त के बाद समाज के साथ ऐसे घुल जाता है कि वह अपना अस्तित्व ही खो देता।

• अगर आप एक पत्थर के टुकड़े को पानी में फेंकोगे तो उसपर ज्यादा कुछ असर नहीं करता है। अगर बहता पानी हो तो वक़्त उसमें चिकनाहट लाता है पर स्थिर पानी का उसपर कोई प्रभाव नहीं पड़ता है।

 उस पत्थर के टुकड़े की तरह अगर हमारा किरदार अपने ज्ञान, अनुभव, समझ और सूझबूझ से सैद्धांतिक बना होता है, तो समाज का उसपर कोई प्रभाव नहीं पड़ता है। वक्त के साथ मिले ज्ञान और अनुभव उसके किरदार को और ज्यादा सुंदर बनाता है।

• फिर अगर आप फिटकरी को पानी में फेंकोगे, तो वह पानी में घुलकर पानी को साफ कर देता है और उसका अस्तित्व पानी के कण-कण में महसूस होता है। पर यह सिर्फ स्थिर पानी में काम का है, बहते पानी में आप फिटकरी डालकर नदी और समंदर को तो साफ कर नहीं सकते हो।

 उस फिटकरी की तरह कुछ लोग सामाजिक सुधार करने का कोशिश करते हैं। उन समाजसेवियों का काम तब तो सही चलता है जबतक समाज में स्थिरता होती है, तब तक उनका गुण भी होता है, पर जब वक़्त बदलता है और समाज अस्थिर होता है तो समाज फिर से अपने मूल रूप में आ जाता है। और फिर वैसे लोगों का अस्तित्व खत्म होने साथ-साथ उनका समाज के लिए किए उनके कार्यों का भी कोई मोल नहीं रहता है।


मेरे जो friends मिट्टी के ढेले की तरह थे-  वो गाली भी सीखे, सिगरेट भी पीए, शराब भी पीए, girlfriend भी बनाए क्योंकि वो दूसरों के thoughts and perspectives से control होते थे। उन्हें फर्क पड़ता था कि दूसरे उनके बारे में क्या सोचेंगे। फिर वो घरवालों और समाज की परवाह करके उनके पसंद की शादी करने लगे, और अब मैं उन्हें उनके ख्वाबों को पीछे छोड़ते हुए समाज में घुलते हुए देख रहा हूँ।


मैं और मेरे कुछ friends पत्थर के टुकड़े की तरह थे- हमने दोस्ती की पर हम मर्यादा में रहे। वक्त के साथ हम और बेहतर होते गए। हम गालियों को जुबान पर आने नहीं देते, कभी smoking नहीं की, शराब नहीं पीए, लड़कियां नहीं छेड़े, अय्याशी नहीं किए, दूसरों पर comment नहीं किए। आज हमारे friends पूछते है कि "तुमलोग शादी कब करोगे ?" और हमारे आंखों में सिर्फ हमारे वो ख्वाब दिखते जिसके पीछे हम भाग रहे है। वक़्त अगर गुजरेगा, और अगर हमने शादी भी अगर कर ली, तो भी हम अपने ख्वाब का पीछा नहीं छोड़ेंगे। हम कभी नहीं बदलेंगे क्योंकि हम समाज को देखकर नहीं बदलते हैं।


मेरे कुछ दोस्त शुरुआती दिनों बहुत ज्यादा समाज सुधारक थे। वो फ़िटकरी की तरह थे। उनके works effective थे। उन्होंने हमें भी अपने काम से प्रभावित किया। हम भी उनके प्रभाव में आ गए। पर जब वक़्त बीता तो वो भी समाज में घुलते हुए अपना voice silent करते चले गए। क्योंकि उन्हें भी समाज के सोच से फर्क पड़ता था। उनकी वो बातें, वो बेहतर कल और समाज का ख्वाब, उनकी agressive सोच, अब शायद उनके लिए भी अहमियत नहीं रखता है। समाज के बाकी लोगों की तरह वो भी अब उन चीजों की बात नहीं करते है। अब बस उन्हें हम याद करते हैं। 


      

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मेरा एक दोस्त है दीपक, वो Inter Science College में साथ पढ़ता था। वो एक बार मुझे डांटा था, जब group में कुछ लोग party कर रहे थे और शराब पी रहे थे। वो मुझे समझाया था कि भले ही ये चीजें मेरे लिए tempting नहीं है, पर फिर भी मुझे ऐसे जगहों पर नहीं होना चाहिए। क्योंकि लोग manipulating होते हैं। जब तक बहुत ज्यादा समझदार नहीं हो, चाहे कितना भी सैद्धांतिक हो वो तुम्हारे दिमाग के साथ खेलेंगे, बातों में फंसाकर तुम्हें शराब पिला देंगे।

और फिर बाद में वही मुझे बताया था- "कोई शराब पीने के लिए बहकाएगा, पर हाँथ पकड़कर पिला नहीं देगा। लोग गलत काम करने के लिए उकसाते है, पर तुम उसे करते खुद ही हो।" मतलब खुद की समझ इतनी होनी चाहिए कि हम लोगों की बातों में ना आए और सही-गलत के फर्क को समझ सके।

जिसका मतलब यह था कि संगत कितन मायने रखता है।


मैंने सिर्फ अपने school के दिनों में ही दोस्त बनाए है। उसके बाद मैं कभी किसी को दोस्त नहीं बनाया। मैं सिर्फ school के दिनों में चुनता था कि मुझे किससे दोस्ती करनी है और सिर्फ उनसे दोस्तों करता था, वो भी सिर्फ बचपन में। College आते-आते मैं दोस्ती करना छोड़ चुका था। उस वक्त मैं किसी को दोस्त नहीं बनाया, बल्कि वो मेरे दोस्त बन गए। मैं किसी को नहीं चुना, वो मुझे चुने और हमारी दोस्ती हो गई। शुरू में मै सिर्फ यह चुनता था कि मुझे किससे दोस्ती नहीं करनी है, पर फिर बाद में मैं यह चुनने लगा कि मुझे किससे कितना closeness रखता है। क्योंकि कोई अपने life में या दूसरों के नज़र में चाहे जैसा भी हो, life में उससे कुछ ना कुछ सीखने को तो मिल ही जाता है। 

पर इसका मतलब यह नहीं है कि वो अब मैं उन्हें मुझे प्रभावित करने देता हूँ, बस वो मेरे लिए ज्ञान, अनुभव और समझ को पाने का जरिया है।


-AnAlone Krishna
10th May, 2026 A.D.

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