• अधूरी ख्वाहिश • ,कृष्ण कुणाल की लिखी कविता

Friday, June 07, 2019 1 Comments
• अधूरी ख्वाहिश •
(किसी ख्वाहिश के छूट जाने और पूरे ना हो पाने के याद में)
,कृष्ण कुणाल की लिखी कविता
( "शाम की लालिमा" की अगली कड़ी )

• अधूरी ख्वाहिश •

एक ख्वाहिश दिल में है ऐसा
जिसे पूरा करने का तलब था,
एक ख्वाहिश है अधूरा
जिसकी चाहतों में ये लब था,
मेरी उल्फत थी कि पाऊं
उसको सोने से पहले,
लफ्ज़ बेचारा था हलक पे
एक बार तो कह लें ॥

वो ख्वाहिशें तो आयी बाहर
पर आँख थक के सो गया ।
लफ्ज़ हलक पे रहा ना ठहरा
पर नींद हावी हो गया ॥

वो जो शाम मिला था
मुझे अनचाहा सा
मेरे नाउम्मीदी के बाद भी ।
जब धोखे में था कि
है नई सुबह मेरी,
मुझे याद है वो आज भी ॥

बीता हुआ वो कल नहीं मेरा,
बस बीत गया मेरा आज है ।
वो बात मेरे जो सोने से पहले की
मुझे नींद में भी याद है ॥

डर था मुझको कि
मेरी कल की सुबह
जाने कैसा पल लाए ।
बस एक बार जब
मैं सोता तो मुझे
सुकून वाला नींद आए ॥

वो आवाज, वो लम्हें,
जो एक बार फिर दोबारा
मेरे मन में फिर एक बार
बस आखरी बार गूंज जाता ।
बेख़ौफ़ होकर मैं अपने
कल की फ़िक्र को भूल
आज रात तो सुकून से
कम से कम सो पाता ॥

क्या पता, कल का सुबह कैसा हो !
क्या पता, कल हो भी या ना हो !
कम से कम जो था उस तो जी लेता ।
कम से कम मैं उसे तो जी लेता ॥


-AnAlone Krishna.
7th June 2019 A.D.


इस कविता के पिछले कड़ी, "शाम की लालिमा" का link है - http://krishnakunal.blogspot.com/2018/09/blog-post.html


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