Life की परछाई : Chapter 10.3 (Individuality of Personal Role) | Bilingual Story written by AnAlone Krishna

Saturday, August 08, 2026 0 Comments
● Life की परछाई ●

By AnAlone Krishna

Chapter 10

 (इस chapter में Individuality को अलग-अलग perspectives से समझाने की कोशिश की गई है। इसे पढ़ें और अपनी प्रतिक्रिया दें। अगर आपको अपना भी नज़रिया share करने का मन करे तो आप comment कर सकते हो।)

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Life की परछाई 
Chapter 10 : Perspectives on Individuality 
(इस chapter को इसके लंबे length के कारण कई parts में divide किया गया है।)
10.2 : Individuality of Personal Choices  
10.3 : Individuality of Personal Role
10.5 : Individuality of Personal Freedom 

● Life की परछाई ●
Chapter 10.3 : Individuality of Personal Role

जब अभिलाषा उदय के साथ court marriage करके hospital आती है, और अपने पिता के पास बैठी उनका हाँथ पकड़कर बैठी होती है, उसके पिता धीमी आवाज में अभिलाषा को बोलते है, "आशा, तुम बहुत जिद्दी हो। मेरा तुम्हें जायदाद से बेदखल करने के धमकी के बाद भी तुम नहीं रुकी।"

अभिषा उनके हाँथ को अपने दोनों हाँथो से ढंकती हुई बोलती है, "I'm sorry Papa."

अभिषा के पिता अभिषा को देखते हैं। अभिषा का माथा झुका हुआ था, यह देखकर अभिषा के पिता अपना माथा दूसरी ओर मोड़ लेते हैं। फिर अभिषा कहती है, "पापा, सुबह मैं गुस्से में कुछ भी अनाब-शनाब बोल गई, इसके लिए मैं शर्मिंदा हूँ। पर पापा, मैं बाद बहुत सोंची इस बारे में, मैं.., मैं सच में ये सब deserve नहीं करती हूँ।"

यह सुनकर अभिषा के पिता अपना माथा अभिषा की ओर किए, अभिषा उन्हें देख रही थी। अभिषा उन्हें आगे कहती है, "Marriage करने के लिए Court का सहारा आमतौर उन्हें लेना पड़ता है, जिनका कोई परिवार नहीं होता है। जो जोड़ें हमारे सामने हमसे पहले खड़े थे, उन्हें देखकर मुझे यह अहसास हुआ, आप मेरे लिए बहुत कुछ किए। आप मुझे अच्छी परवरिश दिए, मुझे पढ़ाए-लिखाए, इस काबिल बनाए कि मैं अपने पैरों में खड़ी हो सकूँ, अपने life में कुछ बन सकूँ। सलोनी कहती है कि काश मेरे जगह वो आपकी बेटी होती, वो मुझे बहुत lucky मानती है। पूर्वी की भी family उसे support नहीं किए, पर आप मेरे लिए पूरे समाज के सामने लड़ जाते हो। क्या मैं आपको शर्मिंदा की हूँ ? आप ही तो मुझे हमेशा अपने लिए stand लेने की प्रेरणा देते आए हो। मैं भी ख़ुद को तब तक आपकी विरासत या संपत्ति में अधिकार नहीं मानूंगी जब तक कि मैं इसके काबिल बन कर ना दिखाऊं।"

अभिषा के पिता उसे बोले, "पर तुम तो अपना career छोड़कर शादी करने गई थी।"

अभिषा कहती है, "पापा, क्या आपको मुझ पर भरोसा नहीं है, कि अगर मैं कुछ बोल रही हूँ तो वह मैं हर हाल में करने की कोशिश करूँगी ? क्या आपको मेरा जिद्द नहीं पता ?"

अभिषा के पिता उससे कहते हैं, "तुम अभी बच्ची हो, दुनियां नहीं देखी हो। एक बार कोई शादी के बंधनों में बंधती है, फिर उसे पूरी जिंदगी उलझ कर रह जाती है।"

अभिषा अपने पिता को समझाने की कोशिश करती है, "क्या आप मम्मी के लिए भी ऐसा ही कहोगे पापा ? क्या आपको मम्मी का भी life रिश्तों में उलझा हुआ लगता है, आपके इतना सब करने के बाद भी ?"

अभिषा के पिता इसका कोई जवाब देने के बजाए वो अभिषा को पूछते हैं, "क्या वह लड़का अपनी family से लड़कर तुम्हें support कर पाएगा ?"

अभिषा कहती है, "पापा वो अपनी family के against जाकर मुझसे शादी किया। क्या मैं अब भी उसपर भरोसा करने के बजाए उसपर शक करूँ कि वह मुझे support करने के लिए अपनी family के against जाएगा कि नहीं ? क्या मेरे इस action के बाद आप मुझे support करोगे, जैसे बचपन से अबतक करते आए हो ?"


अभिषा के पिता इसपर कुछ नहीं कहते हैं, और वह अपना माथा दूसरी ओर फेर लेते हैं। 

फिर कुछ देर और अभिषा अपने पिता से बातें करती है और उसके पिता की आँखें नम होने बावजूद फिर बाद में वो मुस्कुरा कर अभिषा से बात कर रहे होते हैं जब अभिषा की माँ यह देखती है। जब अभिषा Hospital के ward से बाहर निकलती है, उसके कुछ देर बाद अभिषा की माँ अभिषा के पिता से मिलने जाती है। अभिषा की माँ के चेहरे में अभी भी गुस्से का भाव था। वह अब भी अभिषा से नाराज थी। वैसे तो वह यह पहले से ही जानती थी कि अभिषा कभी उसका बात नहीं मानेगी, और वह अपने life को अपने हिसाब से जिएगी। यहां तक कि अपना life partner भी वह खुद से चुनेगी। पर वह अभिषा से यह expect नहीं कर रही थी कि वह ऐसे court marriage करेगी और वह अपने life के इस जरूरी moment में उन्हें शामिल करना जरूरी तक नहीं समझेगी। हालांकि उस वक़्त माहौल ऐसा था कि ये सभी अभिषा की बात नहीं मान रहे थे और अभिषा और उदय को support नहीं कर रहे थे। फिर भी अभिषा की माँ के अंदर भी नाराजगी था कि अभिषा अगर घर से ऐसे नहीं जाती तो अभिषा के पिता को इस तरह hospital में admit नहीं करना पड़ता।


अभिषा की नाराज माँ पूछती है, "आप वैसे तो बहुत बड़ी बड़ी बातें करते हैं। समाज और परिवार का ख्याल करते हैं, फिर भी आप अभिषा के जिद्द के सामने झुक क्यों गए ? पहले आप भी तो इस रिश्ते का विरोध कर रहे थे। आप ही को देखकर हम अभिषा का विरोध कर रहे थे, और अभी आप बदल गए और हम उसके दुश्मन बन गए।"

अभिषा के पिता समझाते हैं, "जब मैं अपने student life में back bench में अपने classmates के साथ बैठता था, उन्हें मैं बाते करते हुए सुनता था। वो ख्वाब देखते थे कि जैसा वो अपना बचपन जी रहे हैं, वो उससे लाख गुणा ज्यादा बेहतर life अपनी आने वाली पीढ़ी को देंगे। उन्हें suffocation होता था जब उनके किसी अपने का उनसे उम्मीद टूटता था और उन्हें उसका गुस्सा झेलना पड़ता था। उनका अपने जिंदगी का ख्वाब उससे अलग होता था जो वो जी रहे होते थे, या जो उन्हें मिल रहा था। वो इस चीज को शायद समझा नहीं पा रहे थे या समझाने की कोशिश करके हार गए थे। जब वो अपनी जिंदगी अपने हिसाब से नहीं जी सकते थे तो वो यह ख्वाब देखने लगे, या यूं कहूं तो यह तय करने लगे कि उनकी आने वाली पीढ़ी कैसी जिंदगी जीएगी। वो यह समझ नहीं पाए कि उनके इस dream की वजह से उनकी भी आने वाली पीढ़ी अपने पसंद से नहीं जी पाएंगे। उनकी आने वाली पीढ़ी को भी किसी और का ख्वाब को जीना होगा। उनकी आने वाली पीढ़ी भी वही दर्द और घुटन में जिएगी जिसमें वो जी रहे है। इस loop को तोड़ने का एक ही तरीका है कि वो अपनी और दूसरों की Individuality को समझे। Individuality, यह शब्द बहुत ही छोटा है, पर इसका अर्थ समझना इतना आसान नहीं। वो इस चीज को नहीं समझे, और उनके बच्चे भी ठीक वैसे ही आज खुद को दूसरों के/अपने बड़ों के सामने खुद को express करने से hesitate करते हैं, जैसे कभी वो किया करते थे। अगर बच्चे individuality को समझेंगे, शायद उनका कष्ट और बढ़ेगा। क्योंकि बड़े लोग उन चीजों को अपना हक़ और कर्तव्य समझते हैं जिनसे बच्चों को तकलीफ़ हो रही होती है। पर अगर हम बड़े इस चीज को समझेंगे तब बच्चों का जिंदगी आसान होगा। मैं उम्मीद करता हूँ हमारे बच्चे भी इस individuality के concept को समझे।"

अभिषा कि माँ पूछती है, "तो फिर पहले क्यों मना कर रहे थे ? उसी समय मान जाते ना।"

अभिषा के पिता कहते हैं, "बच्चे अपनी जवानी में गलती करते ही है। मुझे कैसे पता कि वो किसी चीज को लेकर कितना serious है, या बस उसकी नासमझी। ऐसे में हमारा role उसके life में इस चीज का विरोध करना था, ताकि वो अगर serious हो तभी इस रिश्ते में आगे कदम बढ़ाए, और सही तरीके से। वरना हम उसे अगर पहले ही permission दे देते और वह किसी गलत रिश्ते में पड़ जाती तो...?"

अभिषा की माँ पूछती है, "और अब आप यह कैसे कह सकते हो कि जो वो लड़का चुनी है अपने लिए, वो सही है ? अगर सही होता तो ऐसे भाग कर शादी क्यों किया ? वह family से बात करके दोनों family की सहमति से भी शादी कर सकता था।"

अभिषा के पिता कहते हैं, "क्या तुम अपनी बेटी को नहीं जानती हो ? वो तुम्हारी ही तो बेटी है, परवरिश भी तुम ही की हो। उसके दिल में जो भी ख्वाहिश होता है, वो सीधा उसकी फरमाइश करती है। चाहे वो सही हो या गलत। पर जिद्द सिर्फ तभी करती है जब उसे लगता है कि वह चीज उसके लिए बहुत जरूरी है और उसकी जिद्द सही भी है। आम फरमाइशें वह बस बता कर हम पर छोड़ देती है कि हम उसे इस चीज का approval देंगे या नहीं। उसकी ख्वाहिश अगर सिर्फ देखा-देखी होता बाकी नौजवानों की तरह तो वह इस हद तक जिद्द नहीं करती। वो इस हद तक अगर है मतलब वह उसे अपने लिए बहुत जरूरी समझती है। और इस चीज को जाँचने का कि वह किस हद तक जा सकती है, और क्या तरीका था हमारे पास सिवाय इसके कि हम उनका विरोध करे ?"

अभिषा की माँ यह सुनकर अभिषा के पिता को घूरने लगती है, दो पल शांत रहती है और फिर कहती है, "आपके इस दोहरे स्वभाव के कारण जो हमें वो दुश्मन मानती है, अब उसे आप ही ठीक करोगे।"


यह इंसान का स्वभाव होता है- वह बातों-बातों में अपने प्रश्न और उसके जवाब से भटक जाता है। अगर किसी प्रश्न में एक से ज्यादा topic हो, तब तो यह होने की और ज्यादा संभावना होती है। इस सवाल का जवाब की उदय क्यों अपने घरवालों को नहीं मना पाया अपनी शादी के लिए, यह आपको अगले chapter में मिलेगा।

खैर, अभिषा के पिता अभिषा की माँ से कहते हैं, "तुम सिर्फ मेरी जीवनसंगिनी नहीं हो, तुम मुझे बहुत अच्छे से समझती हो, तुम मेरी सबसे अच्छी दोस्त हो। इसलिए मैं यह जानता हूँ कि तुम उसी वक्त यह समझ गई होगी कि मेरा गुस्सा बस दिखावा है, जब अभिषा को मैं वापस बुलाया। पर क्या तुम यह नहीं समझ पाई कि अगर हमारा role अभी खत्म हो जाता तो मैं already अभिषा से नाराज होने का नाटक खत्म कर देता ?"
अभिषा की माँ पूछती है, "तो आपका ये नौटंकी अभी और चलेगा ?"
अभिषा के पिता कहते हैं, "देखती नहीं हो, मुझे मनाने के लिए तुम्हारी बेटी क्या-क्या कर रही है। तुम्हे यह नहीं देखना है कि और क्या-क्या वह करेगी ?"
अभिषा की माँ कहती है, "वह आपकी भी बेटी है, वह समझ जाएगी आपकी नौटंकी। ज्यादा दिन तक आपका यह भांडा नहीं चलेगा।"
अभिषा के पिता कहते हैं, "पर हमारे दामाद को आजमाने के लिए कि वह हमारा दिल जीतने के लिए क्या-क्या कर सकता है, मुझे लगता है कि हमें अपनी नाराजगी बनाई रखनी चाहिए। तुम क्या कहती हो, इतना तो हमारा हक़ बनता है।"
अभिषा की माँ कहती है, "आपका भांडा फूटेगा तो मैं यह कह दूँगी कि इसमें मेरा कोई हाँथ नहीं है।"
अभिषा के पिता कहते हैं, "ठीक है। फोड़ देना सारा bill मेरे ऊपर। पर अब ये सब बात अभी हटाओ, नहीं तो किसी को शक हो जाएगा।"

उसके वापस उनका family situation वैसा ही हो गया, जिसमें सभी अभिषा के भागने से नाराज है। अभिषा के पिता को hospital में admit करवाना पड़ गया, और अब अभिषा सभी को मनाने की कोशिश कर रही है।

-----Chapter partitioned due to its large length.
Continue your reading in this chapter.-----

Life की परछाई 
Chapter 10 : Perspectives on Individuality 
(Content काफी लंबा होने के कारण इस chapter को parts में divide किया गया है। Comment में बताए कि यह आपको कैसा लगा। )

Story by -AnAlone Krishna.
Published on 8th August, 2026 A.D.

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