* पछतावा और आँसू *
कब तक मैं पचताता रहूँगा, मेरी जिन्दगी में पचतावें बहुत है ।
याद करके रोता रहूँ , ऐसे-ऐसे अफसाने बहुत है ।।
नींद आ रही है मगर मैं जाग रहा हूँ ।
लोग मेरे करीब आ रहे है और मै उनसे दूर भाग रहा हूँ ।।
सुनाने को तो औरो के पास भी तराने बहुत है ।
और मैं अपने ही धुन में राग खुद का अलाप रहा हूँ ।।
ऐ जिन्दगी अब तू जितने भी गम दे मै झेल लूँगा ।
जितना चाहे उतना खेल , मैं अपने ही दिल से खेल लूँगा ।।
होंगे लोग जिनके छलकते होंगे आँसू जब वो गम में डूब जाते हैं ।
अपने तो दिल भरने पर भीगे पलकों से भी आँसू सूख जाते हैं ।।
हम रोयेंगे अब कितना !, जिन्दगी भर रोता रहूँगा ?
जिन्दगी ने मुझको दिये ऐसे-ऐसे दर्द बहूत हैं ।।
-AnAlone Krishna.
06/03/2017

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