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कतरा-कतरा रूह को...

Saturday, July 04, 2026 0 Comments

कतरा-कतरा रूह को,
अक्स से टूटते देखता हूँ...
मैं इल्म को इस जिस्म से
छूटते देखता हूँ।

मैं हूँ अभी ज़िंदा,
पर रहूंगा कब तक पता नहीं...
कायनात को अब खुद से
रूठते देखता हूँ।

मैं ख्वाहिश करूँ पर ख्वाब तो हो,
मैं हर ख्वाब को
टूटते देखता हूँ।
मैं नूर इस ज़िंदगी का
छूटते देखता हूँ।

साए में खो जाए या सन्नाटे में ये रंग,
मैं अपनी ज़िंदगी का हर रंग,
खुद से रूठते देखता हूं।

-AnAlone Krishna
4th July, 2026 A.D.

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