Life की परछाई: Chapter 11.1 (Social Dependency and Independence) | Bilingual Story written by AnAlone Krishna

Monday, October 12, 2026 0 Comments
● Life की परछाई ●

By AnAlone Krishna

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Chapter 11

 (व्यक्ति अलग अलग कारणों से socially depended रहता है। यह chapter उन्हीं पहलुओं को ध्यान में रखकर लिखा गया है। इसे पढ़े और अपनी प्रतिक्रिया दें।)

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Life की परछाई 
Chapter 11 : Social Dependency 
(इस chapter को इसके लंबे length के कारण कई parts में divide किया गया है।)
Chapter 11.1: Social Dependency and Independence 
Chapter 11.2: Social Dependency for the Growth of the Career
Chapter 11.3: Social Dependency to Build the Environment 
Chapter 11.4: Social Dependency to Live Life Happily
Chapter 11.5: Social Dependency to Fulfil the Dreams

● Life की परछाई ●
Chapter 11.1: Social Dependency and Independence

Depended होना प्रकृति का मूल स्वभाव नहीं है। प्रकृति में हर एक जीव independent जीने के लिए पैदा हुआ है। पर जो भी जीव समाज का निर्माण करता है, प्रकृति के मूल स्वभाव के against जाता है, निर्भरता आती है। जो जीव प्रकृति से जितना दूर, अपने life को जितना artificial बनाता जाता है, वह उतना निर्भर होता चला जाता है। मैं समय, सृष्टि के शुरुआत से इस बात का गवाह हूँ, जब जीवन का शुरुआत भी नहीं हुआ था। शुरुआत में जीव कुछ भी खाकर अपने जीवन के लिए ऊर्जा पाता था। उसे नए जीवन को जन्म देने के लिए भी किसी की आवश्यकता नहीं थी। फिर वह male-females में बंटा। उसके बाद उसने अपना निश्चित वातावरण चुना, फिर भोजन चुनने को बेबस हुआ। खुद की सुरक्षा उसके जीवन की आवश्यकत बनी, जिससे उसके शक्तिशाली partner को उसके ऊपर प्रतिबंध लगाने का opportunity मिला। समाज, शक्ति, प्रतिस्पर्धा, अधिकार,...। आज जन्म लेने की सुरक्षा से लेकर पौष्टिक भोजन के लिए अनेक जीव अपने parents पर निर्भर है। इसमें मानव, जितना अप्राकृतिक हुआ, उतना ज्यादा ही अपने समाज और environment पर निर्भर हो गया।

लोग खराब स्वास्थ में सहयोग करे, इसके लिए मनुष्य लोगों से अच्छे व्यवहार नहीं बनता है बल्कि शादी करता है। मनुष्य जब बुढ़ापे में अस्वस्थ हो जाए, उस वक्त के लिए पूंजी नहीं बचाता है, बल्कि बच्चे पैदा करता है। तो जिसपर मनुष्य निर्भर है, उसे वह अपने control में रखने की कोशिश क्यों नहीं करेगा? पर कुछ ही लोग होते हैं जो अपने जीवन में वास्तविक रूप से स्वतन्त्र रहने की कोशिश करते है। कृष्ण का लिखा character उदय, उसी का उदाहरण है। वो किस्से जो उदय के character को समझने में आपको मदद करेंगे, उनका एक भी लम्हां अभिषा के Snapshot में नहीं है। पर मैं तो समय हूँ ना, कृष्ण के imaginary world के उदय का जीवन कैसा है, मुझे पता है। तो चलो आपको इस अध्याय में यही बताता हूँ।

उदय के माता-पिता के तीन बच्चे हैं- पहला उदयशंकर(उदय), दूसरा उसका भाई अरुण, और तीसरी उनकी छोटी बहन निष्ठा। उदय सबसे बड़ा था। इसलिए बाकी परिवारों की तरह उसे भी हमेशा यह समझाया जाता था कि बड़े भाई होने के नाते उन्हें अपने छोटे भाई-बहन का ख्याल रखना चाहिए और उनकी गलतियों को नजरअंदाज कर देना चाहिए। उदय जब अरुण और निष्ठा को किसी बात पर टोकता था, तो उन दोनों यह चीज पसंद नहीं आता था। खासकर अरुण को लगता था कि उदय उन्हें नौकरों की तरह control करने की कोशिश कर रहा है। इसके अलावा छोटे भाई और बहन को हमेशा यह समझाया जाता था कि उदय से वो कुछ सीखे, उसकी तरह अच्छे से पढ़ाई करे, और उसके जैसा बनने की कोशिश करे। इस बात पर निष्ठा तो उतना ज्यादा ध्यान नहीं देती थी, पर अरुण को इससे चिढ़ होता था और वह उदय से जलता था। इसलिए अरुण हमेशा मौका ढूँढता था, जब वह खुद को उदय से बेहतर साबित कर सके, और उदय को गलती सबके सामने लाकर उसे नीचा दिखा सके।


उदय बचपन से एक sapiophile लड़का था। Sapiophile वैसे लोगों को कहा जाता है जो knowledge की तरफ strongly attract होते है, और knowledge acquire करके pleasure महसूद करते हैं। ठीक वैसे ही जैसे आशिक अपनी प्रेमिका के प्यार में पागल रहते हैं। उदय school जाता, पढ़ाई करता, और अपने social experience को उससे corelate करने की कोशिश करता या अपने life में उन knowledge के application ढूंढने की कोशिश करता। पर था तो वह भी एक बच्चा ही। Sorry, हम अभी उस वक्त की बात कर रहे हैं, जब उदय बस एक School student था। जब उदय को यह बात कहा जाता कि वह अपने छोटे भाई-बहन पर ध्यान दे, उसे लगता था कि उसे उनके साथ बांधा जा रहा है। क्योंकि उसकी चेतना, इस बात से बंधी होती थी कि उसे अरुण और निष्ठा के ऊपर ध्यान देना है। फिर जब उदय उन्हें कुछ बोलता था, और ये दोनों उदय की बात नहीं मानते थे, तो उदय को उनके ऊपर ध्यान नहीं देने का मन करता था। फिर जब अरुण और निष्ठा ऐसा कुछ करते थे जिससे उदय hurt होता था, उसे ये दोनों का ख़्याल रखना कोई दीवार धकेलने के जैसा लगता था, बेवजह मेहनत करने के जैसा। जिससे उदय को यह एक बोझ लगने लगा। हालाँकि अपनी शादी के बाद भी उदय अभिषा के साथ उसी घर में अपने माता-पिता के साथ रहता था। पर एक वक़्त ऐसा आया जब उदय उस घर को छोड़कर अभिषा और अपने बच्चों के साथ शहर आ गया। ऐसे क्या हुआ था उस समय, यह तो मैं आगे के अध्याय में बताऊंगा। पर फिलहाल अभी जिस वक्त की कहानी मैं बताने जा रहा हूँ, उस वक़्त उदय और अभिषा के बच्चे मेहक और रॉनी; 7, 10 साल के हैं।

उदय शाम को office से निकला और वह अपने बच्चों के लिए समौसा लेने के लिए ढाबे के पास रूका। उदय की आदत थी- वह काम से घर लौटते समय हर दूसरे-तीसरे दिन बच्चों के लिए कुछ न कुछ लेकर जाता था। कभी समौसा, कभी जलेबी, कभी आलूचाप, अभी पकौड़ा, कभी मालपुआ, कभी धुस्का, तो कभी कुछ। आज ताजे समौसे तले जा रहे थे। जब हलवाई गरम-गरम समौसा तल रहा था, तब अचानक उदय को अपने बचपन का वह किस्सा दिमाग में आकर गुजर गया, जिसकी वजह से उदय के life में बहुत बड़ा turning point आया था। हलवाई गरम समौसे थाल में रखते हुए बोला, "हाँ भैया, आपको कितने समौसे चाहिए?"

उदय हलवाई की बात सुनकर फिर अचानक वह बात भूल गया, जैसे सभी सुबह उठने के बाद अचानक रात और सुबह-सुबह का सपना भूल जाते हैं। वह वहाँ से समौसे लेकर घर गया और समौसे का थैला table में रखकर पैर-हाँथ धोने के लिए Bathroom गया। जब उदय bathroom से पैर-हाँथ धोकर वापस आया तो वह देखा कि रॉनी और मेहक आपस में लड़ रहे हैं। 
रॉनी बोल रहा था, "यह मेरा है।"
मेहक बोल रही थी, "यह मुझे भी चाहिए।"
रॉनी बोल रहा था, "तुम तो आलूचाप बोली थी ना।"
मेहक बोल रही थी, "तो क्या हुआ, यह मुझे भी चाहिए।"
रॉनी बोल रहा था, "तुम खुद बोली थी कि आज जिसका guess सही होगा, सिर्फ वो खायेगा।"
मेहक बोल रही थी, "तुम जरूर cheating किया होगा, पापा को बोला होगा समौसा लाने। वरना पापा रोज-रोज एक ही चीज नहीं लाते हैं।"
उदय गया और दोनों बच्चों को दूर-दूर किया, और उनसे समौसे का थैला ले लिया कि कहीं ये दोनों झगड़ने के चक्कर में थैला फाड़कर समौसा बर्बाद ना कर दे।
मेहक बोली, "पापा आप आज समौसा क्यूँ लाए? आपके चक्कर में मैं शर्त हार गई।" और वह अपना मुँह फूला ली।
रॉनी बोला, "वाह, शर्त हार गई तो दोष पापा को दे रही है। तुम अपना हार मानो, आज तुमको यह नहीं मिलेगा।"
उदय के लिए यह कोई नई बात नहीं थी। रॉनी जब से बोलना सीखा है, तब से वह उदय और अभिषा को परेशान करता आया है। फिर जब अभिषा बात करना शुरू की तब से तो इनके जिंदगी में ये दोनों आतंक ही मचाकर रखे हुए हैं। खैर यह दोनों भाई-बहन का नोंक-झोंक वैसा बुरा नहीं था, जैसा उदय अपने बचपन में जीया था। उदय plastic का थैला दोनों बच्चों के पहुँच से दूर अपने हाँथ को ऊपर किया, और बोला, "यह तुम दोनों में से मैं किसी को भी नहीं दूँगा।"
रॉनी पूछा, "क्यूँ पापा?"
मेहक बोली, "जब आपको खुद ही खाना था तो आप घर लेकर क्यों आए? आप उधर ही खा लेते।"

उदय मुस्कुराया और बोला, "चलो अच्छा सोंच कर बताओ। पापा तुम दोनों के लिए रोज कुछ ना कुछ क्यों लाते हैं?"
Mehak बोली, "क्योंकि पापा को यह सब लाना अच्छा लगता है?"
उदय फिर आगे पूछा, "और पापा को यह सब लाना क्यों अच्छा लगता है?"
रॉनी का height उदय की छाती तक था। वह उदय को अपनी बाँहो में भरते हुए बोला, "क्योंकि पापा हमसे प्यार करते हैं।"
उदय उनसे पूछा, "पर क्या तुम दोनों अपने पापा से प्यार करते हो?"
Mehak का height कम था इसलिए वह सिर्फ अपनी बाँहों से कमर तक ही पहुंच पाई। वह दोनों हांथो से लिपटते हुए बोली, "हाँ पापा। You're my favorite."
तो फिर आगे उदय पूछा, "तो फिर बताओ, क्या पापा को अच्छा लगता होगा, तुम दोनों को इस तरह आपस में झगड़ते हुए देखकर।"
रॉनी उदय को छोड़कर बोला, "पापा, हम तो बस शर्त लगाए थे। और ये हमेशा ऐसा ही करती है। खुद जीतती है तो जबरदस्ती अपना मनवाती है, और हारती है तो मुकर जाती है।"
उदय मेहक का हाँथ छुड़ाते हुए बोला, "और तुम दोनों को पापा का प्यार इस तरह बाँटने का अधिकार कौन दिया?"
Mehak बोली, "पापा, हम दोनों आपके बच्चे हैं, तो आपका प्यार तो हम दोनों के लिए बराबर-बराबर ना मिलेगा!"
उदय उन दोनों बच्चों को 2sec घूरे, और फिर पूछे, "और तुम दोनों को यह बात कौन बोला?"
Mehak फिर दोनों बाँहें फैलाकर, उदय का कमर पकड़ते हुए बोली, "मम्मी।"
उदय बोले, "देखो, तुम्हारे पापा का प्यार ऐसा नहीं है। तुमलोग आपस में झगड़ोगे, पापा को परेशान करोगे, और पापा तुम दोनों को बराबर प्यार देेंगे? जो पापा को ज्यादा खुश रखेगा उसको ज्यादा प्यार मिलेगा, और जो कम खुश रखेगा उसको कम प्यार मिलेगा।"
यह सुनकर रॉनी उदय के हाँथ से समौसे का थैला लेते हुए बोला, "पापा लाइए, आपको यह भारी लग रहा होगा।"
समौसे के थैले को hall के table में रखकर उदय को Sofa में बिठाते हुए बोला, "आप बैठ जाइए, आप थक गए होंगे।"
Mehak समझ गई कि रॉनी मस्खा लगाना शुरू कर दिया है। तो फिर वो कैसे पीछे रहेगी! वह जाकर उदय का पैर दबाने लगी, और रॉनी कंधा और हाँथ दबाने लगा।"
उदय यह सब देखकर बोला, "आ हा, ऐसे पापा को हमेशा खुश रखोगे तब ना पापा तुमलोग को हमेशा प्यार करेंगे।"

अभिषा kitchen में कुछ काम कर रही थी। जब उसके कानों में रॉनी और मेहक का आपस में चिल्लाने और झगड़ने का आवाज आया था, उस वक्त वह इसे पहले ignore की। क्योंकि यह रॉनी और मेहक के बीच आम बात थी। पर जब वह free हुई, तो बाहर hall पे आई यह देखने की आज क्या तमाशा ये लोग कर रहे हैं। अभिषा जब देखी कि उदय sofa पे आराम से पैर पसारे बैठे हुए है, और दोनों बच्चे उसके हाँथ पैर दबा रहे हैं; तो वह हैरान होते हुए अपने हांथों से ठुड्डी सहलाते हुए मुस्कुराने लगी। जब रॉनी अभिषा को देखा, वह उदय को छोड़ अभिषा के पास गया। अभिषा का हाँथ पकड़कर रॉनी अभिषा को भी Sofa में बिठाकर उसका भी कंधा और हाँथ दबाने लगा। यह देखकर Mehak बोली, "पापा, भैया तो मम्मी के आते ही आपको छोड़ दिया। अब तो आप सारा समौसा मुझे दोगे ना?"
तब रॉनी बोला, "पगली, तुम एक बात भूल रही है जो पापा हमेशा बोलते हैं।"
Mehak पूछी, "क्या?"
रॉनी बोला, "अगर आप किसी से प्यार करते हो, तो आपको हर उस इंसान की care करना चाहिए जिसने वो प्यार करते हैं। तुम सिर्फ पापा के पैर दबा रही हो। पापा मम्मी से प्यार करते हैं। इसलिए मैं मम्मी की भी care कर रहा हूँ।"
यह सुनकर Mehak समझ गई कि वह हारने वाली है। इसलिए वह उदय को छोड़ अभिषा के पैर दबाने लगी। यह देख कि Mehak का ध्यान उदय से हटा, फिर से रॉनी अभिषा को छोड़कर sofa के पीछे खड़ा होकर उदय का कंधा दबाने लगा। यह देखकर फिर Mehak अभिषा को छोड़कर उदय के पैर की तरफ हाँथ बढ़ाई, पर उदय उसे बीच में रोकते हुए बोला, "बस, फैसला हो गया।"
Mehak पूछी, "समौसा किसे मिलेगा पापा?"
उदय पैर के पास बैठी Mehak को समझाता है, "तुम्हारा ध्यान उसपर जाता है, जहाँ तुम्हारा भैया का ध्यान होता है। इसलिए तुम इसके पीछे वो काम करती हो। तुम सिर्फ इसका नकल करती हो। पर तुम्हारे भैया का ध्यान वहाँ जाता है, जहाँ से तुम्हारे ध्यान हट जाता है।" उदय एक हाँथ से मेहक को अपने और अभिषा के बीच बिठाते हुए और एक हाँथ से समौसे का थैली रॉनी को देते हुए समझाया-

"जो family को, समाज को, देश को, किसी समूह को या किसी business को lead करते हैं उनके लिए यह जरूरी है कि वह हर एक छोटी-बड़ी चीज पर ध्यान दे। इसके लिए खुद से चीजों को देखकर और समझकर काम करना होता है। तुम अगर किसी से देखकर काम कर रही हो, मतलब तुमसे ज्यादा वो काबिल है lead करने के लिए। इसलिए leader उसे बनना चाहिए तुम्हें नहीं। क्योंकि अगर तुम किसी से पूछ कर, या किसी को देखकर कोई काम कर रही हो, मतलब तुम खुद से कोई काम नहीं कर रही हो। वो तुमसे वह काम करवा रहा है। वह तुम्हें आसानी से झांसा दे सकता है। मतलब तुम आसानी से manipulate हो सकती हो। इसलिए तुम्हें अभी और सीखने और समझदार बनने की जरूरत है। ताकि तुम्हें कोई बहका ना सके, तुम भी हर चीज को अच्छे से समझो, खुद से, और at least अपनी family को lead कर सको।"

यह सुनकर अभिषा बोली, "आप यह सब जो अभी इसे समझा रहे हो, आपको लगता है कि यह अभी समझ भी रही होगी?"
उदय Mehak का माथा सहलाते हुए कहता है, "यह भी अभी समझे या ना समझे, पर मैं उम्मीद करता हूँ कि यह एक दिन जरूर समझने लगेगी। मैं बस चाहता हूँ कि यह बात जल्दी समझे, ताकि यह अपने life में कोई गलती ना करे।"
तब तक रॉनी kitchen से एक थाल में कई कटोरे रखकर, कटोरे में टमाटर और पुदीना की चटनी और थाल के खाली हिस्से में समौसे को रखकर hall में ले आया। Mehak count की, "one, two, three, four, five, six, seven, eight, nine, ten." और फिर बोली, "पापा मैं तीन समौसे खाऊंगी।"
उदय इशारा किया, "ठीक है, खा लो।"

शादी करना, बच्चे पैदा करना, उन्हें पालना, यह कोई महान काम नहीं है। जीवन को meaningful यह बात बनाती है कि आप अपने बच्चों की परवरिश कैसे करते हो। परिवार, समाज, राष्ट्र में प्रत्येक व्यक्ति किसी ना किसी तरह depended है। Depended होना पूरी तरह गलत नहीं है। पर यह समझना बहुत जरूरी होता है कि कब हमें दूसरों पर आश्रित नहीं रहना चाहिए। जैसे उदय अपनी बेटी Mehak को सीख दिया। पर ऐसा हर किसी के parents नहीं होते हैं। खुद उदय के parents जैसी सीख अपने बच्चों को दिए, उससे उदय का छोटा भाई अपने life time बस उदय से compete ही करता रहा। और उदय को छोटी-छोटी बात पर उलझना पसंद नहीं था। वह बस इस  competition को खत्म करना चाहता था।

उदय का गाँव शहर से सटा हुआ था। उसके घर से स्कूल का distance सिर्फ 3Km था। इसलिए उदय और उसका भाई अरुण रोज अपनी-अपनी bicycle से school जाते थे। पर क्योंकि इनकी बहन निष्ठा इनसे छोटी थी, वह auto से school आना जाना करती थी। तीनों एक ही Private school में पढ़ते थे। Auto सुबह उनके गाँव से निकलती थी और दोहपर को छुट्टी होने के बाद इन्हें घर छोड़ देती थी। इसलिए निष्ठा सबसे पहले घर पहुँच जाती थी, और उदय और अरुण थोड़ी देर बाद में घर आते थे। उदय और अरुण के बीच नहीं बनता था। इसलिए ये दोनों ना ही एक दूसरे के लिए रुकते थे और ना ही साथ आना-जाना करते थे। जब उदय 9th class में पढ़ता था, एक दिन अरुण दोस्तो के साथ school से देर निकला। वह आते वक़्त उदय को एक ढाबे के पास दोस्तों के साथ समौसा खाते देखा। अरुण यह देखकर रुक नहीं बल्कि bicycle का paddle चलाते हुए उदय को देखते हुए सीधा वहाँ से निकल गया। वह सीधा घर आया और घर में आकर तमाशा करने लगा कि "घर में सब उसको नौकर समझते हैं। हर कोई बस उसको सब काम बोलते हैं, हुकुम चलाते है, और जब कुछ देने की बारी आती है तो सिर्फ अपने बेड़े बेटे को देते हैं।"
उस दिन इत्तेफाक से उदय के पिता उस वक़्त घर में ही थे। वही गुस्से में निकले और अरुण पर चिल्लाए, "क्या हुआ? घर आते ही क्यों तमाशा शुरू कर दिए हो?"
अरुण और नाराज़गी भरे गुस्से में बोला, "तमाशा! मैं बोलूँगा तो तमाशा ही लगेगा?"
उदय और अरुण के पिता बोले, "क्या हुआ सीधा-सीधा बोलेगा या दो झाप दे अभी? सर नौटंकी बाहर हो जाएगा।"
अरुण डबडबाए आँसुओं के साथ गुस्से से बोला, "बड़ा बेटा मांगेगा तो तुरंत उसको पैसा दे देते हैं, और मैं माँगता हूं तो चवन्नी नहीं निकलता है।"
अरुण के पिता बोले, "कौन दिया उसको पैसा उसको? कब दिया? कोई दिया भी होगा तो कुछ काम से ही दिया होगा।"
अरुण बोला, "हाँ, हाँ। काम से दिये है इसलिए उस पैसे का वह समौसा खा रहा था।"
तब तक उदय की माँ आँगन में बाहर आई और बोली, "क्या हुआ रे? आज क्या हो गया तुमको?"

जब सुबह उदय, अरुण, और निष्ठा school जाते थे तो अक्सर सुबह-सुबह इनकी माँ इन्हें कुछ पैसे दे दिया करती थी, ताकि अगर इन्हें कुछ खाने का मन करे तो ये खा ले।
अरुण बोला, "सुबह जब मैं पैसे मांगा था, उस time आपके पास पैसा नहीं था। तो फिर आपन लाड़ला बेटा के लिए आपके पास कहाँ से आया?"
अरुण के पिता अरुण और उदय की माँ से बोले, "जब बच्चों को पैसे देती हो तो सभी को बराबर क्यों नहीं देती हो?"
उदय की माँ बोली, "हमेशा तो तीनों को बराबर ही देती हूँ। कम रहता है या नहीं रहता है तो चुटकी(निष्ठा) को नहीं देती हूँ। पर इन दोनों को तो बराबर ही देती हूँ।"
तब एक उदय भी घर वापस आ गए। उदय cycle ठीक से आँगन में किनारे किया भी नहीं था कि अरुण फिर बोला, "लो आ गया आपका लाड़ला बेटा। पूछिये इससे कि यह आज समौसा खा रहा था कि नहीं।"
उदय घर के माहौल को पहले समझने की कोशिश करने लगा, कि आखिर चल क्या रहा है। वह अरुण की बात सुनकर उसे घूरा, पर कुछ कहा नहीं। वह हैरान होते हुए अपने पिता की तरफ देखकर बोला, "मेरे समौसा खाने से क्या दिक्कत है किसी को?"
अरुण फिर बोला, "तुम्हारे पास समौसा खाने का पैसा आज कहाँ से आया?"
उदय गुस्से में अरुण को घूरा, पर फिर उसे कुछ नहीं कहा। वह फिर अपने पिता को देखकर कहा, "नानी दी थी, वह बचा हुआ था।"
अरुण फिर बोला, "आज तक बचले था। खत्म नहीं हुआ था। कल तुम्हारा pocket check किए उस वक़्त कल तो नहीं था।"
यह सुनकर उदय अपना गुस्सा रोक नहीं पाया। वह जाकर बाएं हाँथ से सीधा अरुण के shirt का कॉलर पकड़ लिया और दाहिने हाँथ से उसे मारने के लिए हाँथ उठाया। मगर उदय के पिता उसे रोक लिए और पीछे किए।
उदय गुस्से में पूछा, "तो तुम ही मेरे जेब से बिना पूछे पैसे चुराता है?"
अरुण ताव में बोला, "खुद पैसे चोरी करता है और मुझे बोलता है? जब कल तुम्हारे पास था ही नहीं, तो आज कहां से आया?"
यह सुनकर उदय के पिता अरुण को एक झापड़ लगाए। फिर उदय कुछ बोलने ही वाला था कि उसको भी एक थप्पड़ दिए। उदय के गाल में थप्पड़ पड़ते ही उदय रो गया। उदय के पिता उदय के कंधे को अपने हथेली से दबाए हुए थे, ताकि उदय फिर से अरुण की तरफ आगे ना बढ़े। पर उदय अपना कंधा उनकी हथेली से छुड़ाने के लिए झटकाया और वह चुपचाप वहाँ से जाने लगा। पर उदय के पिता उसे रोक लिए, और पूछे "तुम्हारे पास आज पैसा कहां से आया?"
उदय बताया, "जब नानी दी थी वो वाला पैसा मेरे पास था तब एक दोस्त मुझसे पैसे मांगा था। वही आज मुझे वापस लौटाया था।"
उदय के पिता पूछे, "कितना लिया था?"
उदय बताया, "दो सौ रुपए।"
अरुण बोला, "कोई तुमसे इतना पैसा क्यों मांगेगा? उसके माँ-बाप नहीं है?"
उदय और और उसके पिता, दोनों अरुण को घूरे, पर उसे कुछ कहे नहीं। उदय के पिता उदय को जवाब देने का इशारा किए।
उदय बोला, "वो अपने बड़े भाई के साथ hostel में रहता है। उसको tuition fee देना था।"

उदय lucky था कि उसका गाँव शहर के बगल में था, और वहाँ अच्छा school भी था। पर ऐसा किस्मत हर बच्चे का नहीं होता है। कई बच्चे ऐसे गाँव में रहते हैं जहां से शहर पहुँचने के लिए उन्हें घंटों सफर करना पड़ता है, और नजदीक कोई अच्छा school भी नहीं होता है। वैसे बच्चे अपने बड़े भाई-बहन या अपने किसी relative, जो शहर में college या काम करते हैं, उनके साथ शहर आ जाते है। ताकि उनके साथ रहकर वह पढ़ाई कर सके। ऐसे बच्चे जब घर जाते हैं, यह घर से कोई आता है तो उन्हें महीना खर्च के लिए पैसे मिलते हैं। फिर वो उसी से पूरा महीना अपना जरूरत पूरी करने की कोशिश करते हैं।

उदय का जवाब सुनकर अरुण बोला, "अकेले दो सौ का समौसा खा गया?" उसका कहना था कि जरूर पैसे दोस्तो के साथ उड़ाया है।
उदय समझ गया कि उसके पिता इसका भी जवाब मांगेंगे। वह खुद ही बोला, "आज 50रुपए ही लौटाया है। बोला कि उसकी माँ बोली है कि अगले सप्ताह उसके चाचा जब काम से शहर आएंगे तो उसके हांथों भिजवा देगी।"
उदय के पिता बोले, "अगली बार से कोई पैसे मांगेगा तो बता देना या पूछ लेना।"
अरुण आगे बोला, "अपना खैर है ही नहीं, उधारी देते फिर रहा है।"
यह सुनकर उदय अपना आँख बंद करके अपना गुस्सा दबाया, और बोला, "हाँ, मालिक और उसके उत्तराधिकारी के पास तो सब हिसाब देना ही होगा।"
यह सुनकर उदय के पिता अपना गुस्सा रोके, और बोले, "जब दोस्तों के साथ खा रहे थे, उस time इसको भी क्यों नहीं खिलाए?"
उदय नहीं समझ पाया कि इसका वह क्या जवाब दे। वह उल्टा पूछा, "नानी तो इसको भी पैसे देकर गई थी, यह मेरे साथ share किया? मैं कभी पूछने गया हूँ इसको? और जो मेरे जेब से चुराता है वो क्या करता है?"
अरुण अपने बचाव में बोला, "मैं तुम्हारा पैसा कभी नहीं लिया हूँ। बस जेब check किए थे?"
उदय पूछा, "जब चुराता नहीं है तो क्यों check करता है?"
अरुण बोला, "क्योंकि मेरे से छुपाकर तुमको ज्यादा मिलता है।"
उदय का पारा और चढ़ा। पर उसके पिता बोले, "बस, बहुत तमाशा हो गया।" और अरुण को बीस रुपया देते हुए बोले, "ये लो, जाकर खा लेना जो खाना है, और यह तमाशा बंद करो।"
फिर उदय के पिता पीछे मुड़े और जाने लगे। पीछे अरुण जीभ निकालकर नोट दिखाकर उदय को चिड़िया और उदय से रहा नहीं गया। वह अरुण के पास गया, उसके shirt का कॉलर पकड़ कर दो झापड़ दिया। इनके पिता तुंरत पीछे मुड़े इन्हें छुड़ाने के लिए। तब तक उदय चार झापड़ अरुण को और लगा चुका था। उदय के पिता उदय को मारते हुए अलग किए, उदय के आँख में आंसू था लेकिन, वह मुस्कुरा रहा था। जैसे कि अरुण को पीटकर वह अपना तकलीफ भूल गया हो। फिर वह मुस्कुराते हुए अपने कमरे की ओर जाने लगा। बरामदे में निष्ठा खड़ी होकर इन्हें देख रही थी। उदय जाते हुए निष्ठा का छोटी खींचा और निष्ठा उसे कहूँनी मारी।

अगले सप्ताह उदय अपने पिता के पास school fee भरने के लिए पैसे माँगने गया। वैसे तो लगभग हर महीने उदय के पिता मुनीम से पैसे भिजवाकर fee जमा कर दिया करते थे। पर कभी कभी देरी हो जाती थी तो Class-teacher बकाया fee वाले बच्चों का class में नाम पुकारा करते थे। उदय का class में नाम आया इसलिए वह घर में अपने पिता के पास पैसे माँगने गया। पर उसके पिता उसे पूरा पैसे देने से मना कर दिए। वह आधे दिए और बोले, "तुम्हारा दोस्त तुम्हें पैसे लौटाने वाला था ना? वो मिलाकर fee जमा कर देना।"
उदय की माँ उदय के पिता को पूछी, "क्यों परेशान कर रहे इसे। पूरे पैसे दे दीजिए ना। वो लड़का कब देगा, नहीं देगा!" 
पर उदय के पिता मना करते हुए बोले, "इसे भी समझ आना चाहिए कि उधारी में दिया पैसा समय आने पर काम नहीं आता है। यह अभी कमा भी नहीं रहा है उधारी देता फिर रहा है। जब कमाने लगेगा तब तो सारा पैसा उधारी में ही फँसा देगा।"
उदय कुछ नहीं बोला, बस खड़े होकर चुपचाप सुनता रहा। उदय का self-respect शुरू से बहुत था। उसे जरूर था पैसों का। उसके बिल्कुल पसंद नहीं था कि class में daily-daily उसका नाम पुकारा जाए। पर उसे किसी के सामने किसी चीज के लिए गिड़गिड़ाना और ज्यादा पसंद नहीं था। वह dilemma में था कि क्या करें। क्योंकि उसके लिए दोनों ही शर्मिंदगी की बात थी। वह वहाँ खड़ा था कि कोई तीसरा विकल्प निकले। शायद उसके पिता उसे पैसे दे दे। पर उसके पिता उसे बोले, "खड़े क्यों हो, जाओ।"
और यह सुनकर उदय मुँह लटका कर वहाँ से चला गया।

एक बार उदय, कृष्ण, और उसके बाकी सभी दोस्त college के गलियारे में खड़े होकर अपने future के बारे में बात कर रहे थे। तब कृष्ण का एक दोस्त बोला-
"It is not matters कि मैं अपने father के business में कितना time देता हूँ। जिस दिन मुझे पैसों की जरूरत होगी ना, चाहे जरूरत पड़ने पर मेरे दोस्त मुझसे मांगे या मुझे शाम को नाश्ता ही क्यों ना करना हो; मैं counter से बिना पूछे निकाल नहीं सकता हूँ। मैं एक-एक पैसे का हिसाब देना होगा। इसलिए कहीं और चाहे मैं कम ही कमाऊँ, पर मेरा खुद का पैसा होगा ना, मैं अपने हिसाब से खर्च कर सकता हूँ।"
बीच में यह चीज क्यों बता रहा हूँ, आगे कहानी पढ़ोगे तो समझ जाओगे।

जब उदय के पिता उदय को पूरी fee देने से मना कर दिए, उसके बाद से उदय रोज घर late से आने लगा। निष्ठा जल्दी आती थी और खेलने, या सहेलियों के घर, और उधर से ही tuition निकल जाती थी। अरुण भी कभी दोस्तों के साथ match के चक्कर में कभी late आता, तो कभी जल्दी घर से निकल जाता था। उदय के पिता वैसे भी काम के बाद शाम को late से घर आते थे, और उदय की माँ गाँव मोहल्ले में दूसरी औरतों के साथ कभी गप करने में लगी रहती थी। सप्ताह, दो सप्ताह तो इस बात पर किसी का ध्यान ही नहीं गया। जब उदय की माँ घर आती तो यह मान लेती कि सभी बच्चे दोपहर का खाना का लिए होंगे, इसलिए शाम का खाना बनाने के लिए बर्तन धो देती थी। जब उदय की माँ घर late से लौटती थी, तो उदय को late से खाना खाते देख टोकती थी। पर जब उदय की माँ जल्दी घर आती थी तो बचा हुआ खाना बकरियों और कुत्तों को खिला देती थी, जिससे उस दिन फिर उदय को भूखे रहना पड़ता था। दूसरा सप्ताह जब उदय देखा खाना खत्म है, और kitchen के बर्तन साफ है, तो वह समझ गया कि ऐसे काम नहीं चलने वाला है। वह जब घर आता था तब या तो माँ घर में नहीं होती थी, या फिर वह किसी काम में व्यस्त रहती थी जिससे उसे इतने दिन बीतने के बाद भी उदय के घर late आने की बात का भनक तक नहीं लगा। दो तीन दिन तो ऐसा हुआ कि उदय दोपहर का भी खाना नहीं खा पाया, फिर अगली सुबह late से नाश्ता बनने और जल्दबाजी के चक्कर में सुबह भी नाश्ता नहीं कर पाया। फिर घर लौट तो, फिर खाना साफ था। उदय समझ गया कि ऐसे नहीं चलने वाला है। उदय एक शाम अपनी माँ को बोला कि वह भी रात का खाना बनाने में मदद करेगा। उसकी माँ पहले तो हैरान हुई , पर खुश भी ही यह सोंच कर कि शायद school खत्म होने के बाद बाहर जाना पड़ेगा इसलिए अभी से खुद से खाना बनाने की practice करना चाह रहा होगा। वैसे भी उदय ऐसे अजीब-अजीब experiments अपने life में करते ही रहता था। उसकी माँ खुशी-खुशी उदय का बात मान गई। जब शाम को उदय सब्जी काटता था, तो वह जानबुझकर ज्यादा काटता था। चावल भी ज्यादा डालता था। उसकी माँ को लगता था कि अभी इसे अंदाजा नहीं होता है, व्यक्ति के हिसाब से कितना खाना बनाना है। पर उदय जानबुझकर ज्यादा खाना बनाता था। ताकि रात का बचा हुआ खाना भर पेट खाकर वह सुबह school जा सके। अरुण और निष्ठा बासी खाना देखकर नाक चिढ़ाते थे। उदय की माँ पहले दिन उदय को बासी खाना खाते देखी तो अगले दिन उसे fry कर दी। फिर उदय समझ गया कि कम time में बासी खाना को कैसे fry करके खाना है। 

महीना बीतने वाला था, कि एक दिन उदय पिता घर जल्दी आ गए। वह उदय को late से घर आए देख, पहले तो उसे बहुत सुनाये। पर तब भी उदय घर में कुछ नहीं बताया। सात सप्ताह बीतने के बाद एक दिन किसी करीबी परिचित से उदय के पिता को पता चला कि उदय कि school के बाद उदय शहर में किसी के घर गया था। पहले तो उदय के पिता सोंचे कि वह अपने किसी दोस्त के घर गया होगा किसी काम से। पर उसके पिता के परिचित बताए कि उस घर उम उदय के उम्र का कोई लड़का नहीं है, और ना ही उस घर में room rent में दिया जाता है। उस घर में उदय की हमउम्र या थोड़ी छोटी लड़की रहती है, और उसका भाई उससे भी बहुत छोटा है। यह सुनकर उदय के पिता का पारा चढ़ा। वह घर आकर गुस्से में उदय को बुलाए। उदय की माँ, उसका भाई अरुण, और उसकी बहन, सभी डर से काँप गए और दौड़ कर आंगन में आए जहां उदय के पिता थे। यह जानने के लिए कि आज क्या हो गया। जब उदय अपने पिता के सामने गया, उदय से वह पूछे, "आज school के बाद कहां गया था?"
पहले तो उदय कुछ नहीं बोला, पर उसके पिता और ज्यादा गुस्से से बोले, "आज school के बाद कहां गया था?"
उदय धीरे से बोला, "Tu... tuition पढ़ाने।"
उदय के पिता बोले, "Tuition पढ़ाने अपने उम्र के लड़की के घर? और कौन लगा दिया वहां।"
उदय बोला, "वह एक class junior है। English वाले Sir बहुत दिन से बोल रहे थे।"
उदय पिता बोले, "तुम्हें school पढ़ाने भेजते है या कमाने के लिए? क्या चीज का कमी है जो तुमको अभी से काम करना पड़ रहा है? क्या चीज घट रहा है जो तुमको कमाना पड़ रहा है?"
उदय बुदबुदाते हुए बोला, "मुझे भीख मांगना पसंद नहीं है।"
"भीख मांगना...!" 
घर के बड़ा बेटा-बेटी का जिद्द आप समझते ही होगे। वो कुछ मांगते है तो एक ख्वाहिश में दो। वो दोबारा नहीं मांगेंगे। वो छोटे बच्चों की तरह छाती नहीं पीटेंगे, तमाशा नहीं करेंगे। बस उनका हर एक ख्वाहिश बस एक मांग में पूरा होना चाहिए।
उदय के पिता बोले, "तुम्हें अपने माँ बाप से कुछ माँगना, भीख माँगना लगता है? कब से जा रहा है वहाँ?"
उदय बोला, "डेढ़ महीना से।"
उदय के पिता माथा धर लेते हैं, "डेढ़ महीना से...।" मतलब यह तब से tuition पढ़ाना शुरू किया है जब से वह उदय को school पूरा देने से मना किए थे। वह उदय को सबक सिखाने चले थे, खुद सबक सीख गए। वह उदय की माँ को डांटे, "तुम क्या करते रहती हो घर पर? डेढ़ महीना से बेटा रोज घर late से आता है, और तुमको भनक तक नहीं है?" और फिर बाकी बच्चों को डांटे, "तुमलोग हर बार पे इसका नकल करते हो, और बुराई करते हो। ये बात पे तुमलोग का ध्यान नहीं गया। सिर्फ इसपर तुमलोग का ध्यान जाता है कि यह क्या खा रहा है और इसको कितना पैसा मिल रहा है?"
अरुण कुछ बोलने ही वाला था कि उदय के पिता बोले, "चुप, एकदम चुप।"

अब समझ में आया इनको कि उदय क्यों रात को मां के साथ खाना बनाता था। वह खाना गलती से ज्यादा नहीं, बल्कि जानबुझकर ज्यादा बनाता था, ताकि कुछ सुबह के लिए भी बचे। वह tuition पढ़ाने की बात छुपाने के लिए, यह काम बिना बताए कर रहा था। वह सिर्फ रात का खाना भर पेट खा पाता था और दोपहर को कभी-कभी उसे भूखे रहना पड़ता था। इसलिए सुबह कम से कम भर पेट वह खाकर school निकले, इसके लिए बासी खाना ही सही, बिना बताए वह इस तरह अपना तिकड़म लगाया था। लेकिन फिर भी वह पैसे के लिए अपने माँ-बाप के पास भी गिड़गिड़ाया नहीं।

उदय के पिता उदय का हाँथ पकड़कर अपने मुनीम के पास ले गए। वह एक व्यापारी थे। खरीद बिक्री, रोज का काम था उनका। उनके नीचे कई लोग काम करते थे। इसलिए देखरेख के लिए वह अपने एक भरोसेमंद दोस्त को मुनीम रखे हुए थे। उदय के पिता उदय को मुनीम के पास ले जाकर बोले, "ये जब जितना पैसा मांगेगा, दे दीजिएगा और मेरे नाम से चढ़ा कर हिसाब करते time मुझे बाद में बता दीजिएगा।" और फिर उदय को बोले, "जितना जरूरत होगा, इनसे यहां आकर मांग लेना। और कल school में बोल देना कि अब से तुम tuition पढ़ाने नहीं जाओगे।" फिर खुद में बोले, "उस अग्रेजी मास्टर को तो school जाकर बताना दिखाना पड़ेगा। उसका इतना हिम्मत हो गया है कि मेरे बच्चे का भविष्य खराब करेगा...! उसका सारा मास्टरी निकलेंगे हम।"
दुनियां में अलग-अलग तरह के पिता होते हैं। उदय के पिता उनमें से थे जो उदय को अपने से ज्यादा कामयाब देखना चाहते थे। इसलिए वही नहीं चाहते थे कि उदय पढ़ने के उम्र में कमाने पर ध्यान दे। वह उदय का result याद किए, फिर जो-जो subject में उदय के कम marks आये थे, उदय से बिना पूछे वो tuitions लगवा दिए। यह सोंच कर कि जब इसके पास समय ही नहीं रहेगा तो यह कहीं tuition पढ़ाने कहां से जाएगा। Parents का प्यार, कभी जिंदगी खुशहाल भी बनाता है, तो कभी दमघोटूं भी हो जाता है।

जबतक उदय school में रहा, उसका life ऐसे ही बीता। सुबह अरुण और निष्ठा के साथ school के लिए निकलता। फिर छुट्टी के बाद बाजार जाता जहां उसके पिता व्यापार करते थे। उसके पिता अपने साथ-साथ उदय के लिए भी दोपहर के खाने का tiffin साथ में ले जाते थे। फिर वहां खाने के बाद tuition के time होने पर उदय tuition चला जाता था। फिर वह सीधा शाम को tuition करने के बाद घर लौटता था। एक दिन अरुण अपने जिज्ञासा से उदय के पीछे-पीछे गया कि आखिर यह school के बाद कहां जाता है। उदय बाजार गया, मुनीम के table के नीचे tiffin निकाला। उस दिन उदय के पिता वहां नहीं थे, और मुनीम labours का काम देख रहे थे। अरुण को लगा कि उदय यहां आकर पैसे चुरा रहा है। वह तुरत चिल्लाया, "यह तुम यहां क्या कर रहा है?"
जिससे उदय का ध्यान अरुण पर गया, और मुनीम का भी ध्यान इन दोनों पर गया। उदय यह बोल ही रहा था कि, "तुम यहां क्या कर रहा है?"
तब तक अरुण आकर उदय का हाँथ पकड़ लिया। उदय tiffin खोल रहा था, जब अरुण हाँथ पकड़ा। Tiffin का एक box अरुण के तरफ़ करते हुए उदय बोला, "खायेगा क्या?"
अरुण ईर्ष्या से बोला, "तुम ही खाओ।"
मुनीम वापस आकर अपनी कुर्सी पर बैठ गए और उदय पीछे खाली और साफ जगह देखकर बैठ कर खाना खाने लगा। मुनीम अरुण को देखकर बोले, "तुम यहाँ क्या कर रहे हो?"
अरुण के मन में कोई बहाना नहीं सूझा तो वह बोला कि, "मुझे पापा से कुछ काम था।" और फिर वहां से चला गया।
उस दिन तो मुनीम इस बात को ignore किए, पर कुछ दिन और आने पर वह उदय के पिता को बोले, "आपका छोटा लड़का बड़े वाले के पीछे-पीछे 3-4 दिन आया है। और पूछने पर बोलता है कि उसको आपसे काम है इसलिए वह आया है।"
यह सुनकर उदय के पिता बोले, "छोटा वाला हर चीज में बड़े की देखा-देखी करता है। उसके सामने बड़े वाले को कभी पैसे नहीं ना दिए हो आप?"
मुनीम बोले, "नहीं।"
उदय के पिता बोले, "इस बात का ध्यान रखियेगा और उसके सामने मत दीजिएगा। अभी छोटा है, समझता नहीं है। कोई भी माँ-बाप अपने बच्चों के ऊपर बराबर आखिर कैसे खर्च करें! बड़े बच्चे की जरूरत ज्यादा है अभी। जब छोटा वाला का जरूरत ज्यादा होगा, तब बड़ा वाला खुद कमाने लगेगा। बेटी में खर्च ज्यादा होता है।"
मुनीम बोले, "बड़ा वाला तो आपका अभी से ही कमा रहा था, आप छुड़वा क्यों दिए?"
उदय के पिता बोले, "ये कोई कमाने की उम्र है? अभी पढ़ेगा-लिखेगा नहीं, दुनियां और जिंदगी को समझेगा नहीं, हस्त कौशल नहीं सीखेगा तो क्या जिम्मेदारी का बोझ पड़ने पर सीखेगा? मेरा आर्थिक स्थिति इतना भी खराब नहीं है कि बच्चों को ठीक से पढ़ा ना सके। बस ये फिजूल में जो उड़ाते हैं, वो बोझ बढ़ाता है।" 
मुनीम पूछे, "तो क्या करना है छोटे वाले का?"
उदय के पिता बोले, "अभी उसका खेलने-कूदने का उम्र है। दो साल बाद जब वह नौवीं कक्षा में जाएगा, तब उसका tuition लगाएंगे। अभी बस वो अगर यहाँ आए तो इस बात का ध्यान रखियेगा।"
मुनीम उदय के पिता की बात समझ गया। 

इन सभी चीजों के कारण उदय को अपने life में घुटन महसूस होने लगा। वो बस किसी तरह अपने घर के माहौल से बाहर निकलना चाहता था। इसलिए जब वह school खत्म करके college में admission लिया था वह भी घर शहर नजदीक होने के बावजूद दोस्तों के साथ hostel में रहने लगा। उदय की माँ मना कि, पर उदय के पिता बोले कि"रहने नो, दोस्तों के बीच एक माहौल बनता है। उसे अपनी जिंदगी को समझने दो।"
उदय की माँ मना की कि, "इसी बात के तो डर है कि कहीं गलत माहौल में बिगड़ ना जाए।"
पर उदय के पिता बोले कि, "अरे मेरा बेटा है। माहौल के हिसाब से ढलेगा नहीं। बल्कि जहाँ रहेगा अपने हिसाब से माहौल को ढाल देगा।"
उस time 1st time उदय को अपने पिता पर proud हुआ। इससे पहले आखरी बार कब हुआ था, उसे याद भी नहीं था। फिर उसके बाद College में जबतक उदय रहा, वह कैसे माहौल को अपने हिसाब से ढाला, यह तो उसके दोस्त ही जानते हैं। जिसका थोड़ा-थोड़ा hint आप previous chapters में भी पढ़ चुके हो।


-----कहानी तो अभी बस शुरू हुई है।
पर मुझे आपके इंतजार के लिए खेद है।
Working on next parts.-----

Written by AnAlone Krishna 
Finished and Edited on 11th October, 2026 A.D.
Published on 12th October, 2026 A.D.


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