हमारे parents बचपन से हमें यह कहते हुए बड़ा किये हैं कि "तुम्हारे लिए हम जितना कर रहे हैं, देखेंगे ना कि तुम बड़ा होकर हमारा उतना कद्र या फिक्र करेगा कि नहीं..!"
पता है इस तरह के बातों का हमारे मनोदशा पर क्या प्रभाव पड़ता है ?
यह असुरक्षा के भाव का स्वरूप है। जिनसे हम प्रेम करते हैं, उनके दिल से अपने लिए प्रेम के खोने डर का स्वरूप। इन बातों से हम ऐसी हालत में उन्हें(जिनसे हम प्रेम करते हैं) किसी ना किसी प्रकार से खुद से बाँधने का सीख लेते हैं। कभी अपने शब्दों के जरिए, कभी क़समों या वादों के जरिए, कभी किसी रिश्ते के जरिए हम लोगों को खुद से बाँधने की कोशिश करते हैं। हम इस बात को भूल जाते हैं या समझ नहीं पाते हैं कि यदि किसी बँधन में बाँधकर हम किसी का प्रेम पाने की कोशिश कर रहे हैं, इसका मतलब तो यही हुआ ना कि उसके दिल में हमारे लिए प्रेम है ही नहीं।
इसलिए इस तरह के वाक़्य जो अक्सर हमारे बीच प्रयोग किये जाते हैं, वह गलत है और हमें ये सभी हमें गलत प्रेरणा देते हैं। सही सीख यह है कि जिनसे आप प्रेम करते हो, उन्हें आप स्वतंत्र छोड़ दो। अगर उन्हें आपके प्रेम की कद्र होगी तो वो भी आपको प्रेम अवश्य देंगे। जिनके दिल में आपके लिए प्रेम नहीं होगा वह सिर्फ आपसे रिश्ता निभाएंगे वह आपकी अपने दिल से कभी फिक्र या कद्र नहीं करेंगे, और इस बात का आपको हमेशा असंतोष होगा।
● प्यार हमेशा एकतरफ़ा ही होता है, निःस्वार्थ रूप से। वह तो सामने वाला इंसान होता है, अगर आपके प्रेम की कद्र करने वाला होता है तो बदले में वो भी आपसे प्रेम करता है। वहीं अगर वह स्वार्थी होता है तो वह आपके प्रेम की कद्र नहीं करता, आपके दिल को आहत पहुँच सकती है इस बात की वह फिक्र नहीं करता।
12th March, 2020 A.D.
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