प्रकृति है, कोई भी शरीर एक वक्त तक बढ़ता है, परिपक्व होता है, और फिर बूढ़ा होते हुए decoy होना शुरू हो जाता है।
इंसान का शरीर आमतौर पर सिर्फ 24-30 साल तक ही grow करता है, फिर यह धीरे-धीरे मरने लगता है।
मृत्यु, कईयों को लगता है कि एक क्षण की होती है, पर सच तो यह है कि यह जन्म के साथ ही शुरू हो जाती है। हमारे शरीर का कोई हिस्सा(Cells) हर दिन जन्म लेता और मारता है।
जीवन और मृत्य एक ही सिक्के के दो पहलू है। बुद्धिमानों को अपनी मृत्यु का आलिंगन भी वैसे करना चाहिए जैसे वो अपने जीवन का करते हैं।
मैं अपने दादाजी का मृत्यु देखा हूँ। बेशक शरीर छोड़ना उनके लिए भी कष्टदाई होगा। But वो हर रोज की तरह सुबह नदी से नहा कर आए, hotel में चाय पीए, सुबह नाश्ता किए, फिर 10 बजे तक normally गांव मोहल्ले में टहले-भूले, और फिर heart attack से उनकी मौत हुई।
मैं भी चाहत हूँ कि मेरी भी मौत ऐसी ही हो, एक स्वस्थ शरीर के साथ। बुढ़ापा जीवन पर मृत्य का बढ़ता प्रभाव है।
अपनी बची-खुची जीवन ऊर्जा को निचोड़ कर ऐसे जीना है, भले मृत्य जल्दी हो, पर स्वस्थ शरीर में हो।
-----
• शादी क्यों करनी चाहिए ? अपने बुढ़ापे का सहारा के लिए।
• बेटा क्यों चाहिए ? ताकि वह घर का चिराग मरने के बाद मुखाग्नि दे।
• समाज के चार लोगों के साथ उठना-बैठना क्यों होना चाहिए ? मरने के बाद लाश को कंधा देने के लिए।
• दस रिश्तेदार क्यों चाहिए ? ताकि वो श्राद्ध का नेग-नियम अच्छे से संपन्न करवाए।
• धन-संपत्ति क्यों जमा करनी चाहिए ? ताकि ब्रह्मभोज अच्छे से हो सके।
जीवन में धन, रिश्ते, लोग,... हर चीज का संचय इंसान अपनी मृत्यु की तैयारी के लिए ही करता है। फिर जब ये सारी चीजें उसे प्राप्त हो जाती है तो उसे इनसे मोह हो जाता है। संसार की माया यही तो है। वह यह भूल जाता है कि वह तैयारी अपनी मृत्यु का किया है, और जब मृत्यु उसके करीब आती है तो वो अपनी संचित चीजों को भोग ना पाने का अफसोस करता है और अपनी मृत्यु के टलने की इक्षा करता है।
जबकि उसे यह कभी नहीं भूलना चाहिए कि वह क्या और क्यूँ कर रहा है।
मृत्यु आखिर किसका इंतज़ार करती है कि वो पहले अपने लिए सामान जुटा ले, वह अपना मन भर ले, फिर वह आएगी ? क्या मृत्य किसी को बता कर आती है ? व्यक्ति को कभी नहीं भूलना चाहिए कि वह तैयारी अपनी मृत्यु का ही कर रहा था। फिर अगर चौखट पर आकर खड़ी हो जाए मृत्यु, तो अफसोस करने के बजाए उसका आलिंगन करते हुए मुस्कुराकर खुद से कहना चाहिए कि "चलो अब आ ही गए तो ठीक है, जितना कर सके उतने में ही ले चलो।" और उसे अफसोस नहीं करना चाहिए।
तिब्बती बौद्ध धर्म में रेत से बने मंडल (Sand Mandala) को बहुत ही मेहनत से बनाने के बाद फिर उसे मिटाने की एक परंपरा है। ताकि हफ़्तों की कड़ी मेहनत से अपने बनाए इस अद्भुत आर्ट को एक झटके में खुद ही मिटाकर भिक्षु 'मोह-माया' या 'जुड़ाव' को छोड़ने का अभ्यास कर सके। इसी का सामाजिक रूप दक्षिण भारत में सुबह-सुबह रंगोली बनाने की परंपरा है। वो सुबह बहुत ही प्यार से घर की चौखट पर रंगोली बनाकर काम पर निकलते हैं और शाम को जब वह लौटने के बाद वो अपनी रंगोली को मिटा हुआ देखते हैं तो, वो हर रोज इस चीज का अहसास करते हैं कि वो अपने जीवन में इसी तरह व्यस्त रहेंगे और उनकी जिंदगी उस रंगोली की तरह एक दिन कब मिट जाएगी उन्हें पता भी नहीं चलेगा।
हमारी जिंदगी कैसी होगी, यह हम अक्सर नहीं चुन सकते हैं। पर अक्सर हम यह चुन सकते हैं कि हम जीना कैसे चाहते हैं।
और मुझे अपनी मौत से डरते हुए नहीं जीना है। मुझे किसी चीज का अफसोस लेकर भी नहीं मरना है। तो खुद को हमेशा होश में रखना जरूरी है, मोह-माया से खुद को मुक्त रखना...।
10th March, 2026

Post a Comment
I am glad to read your precious responses or reviews. Please share this post to your loved ones with sharing your critical comment for appreciating or promoting my literary works. Also tag me @an.alone.krishna in any social media to collab.
Thanks again. 🙏🏻