• अलविदा मेरे हमसफ़र •
(अपने द्वारा किसी को ठुकराए जाने वाले शख्स के पास वापस आने पर खुद के लिए उससे पहले की तरह कद्र ना मिलने पर उसे उसकी life में आगे बढ़ने का best wishes देते हुए)
कृष्ण कुणाल की लिखी कविता
• अलविदा मेरे हमसफ़र •
हम चले जा रहे है
अब उनके नज़रों से बहुत दूर..,
जिनकी रगो में हमारे होने से
खलिश हो जाया करती थी।
बढ़ जाती थीं दिल की धड़कनें
और तेज हो जाती थी सांसें..,
जिनकी इस हालत को देखकर
मेरी धड़कन थम सी जाया करती थी॥
ख़ुश रहना मेरे बाद
मुझे चोरी छिपे निग़ाहों से देखने वालो...
जो पड़ते ही मेरी नजर
नजरें हटा लिया करते थे।
उन्हें हैरत थी कि
हम उन्हें देखते थे बेगैरत से भी नहीं...
अरे पराई चीज़ों में नज़रे लगाना
हमारे संस्कार में नहीं थें॥
हां तकल्लुफ नहीं किया था
दो शब्द उनके तारीफ में कहकर...
ज़रूर इस दिल को उस दिल की
थोड़ा तो कद्र हुआ होगा।
मगर कम्बख़त इस छोटी सी खता की
इतनी परवाह कर बैठे वो...
जमाने के ताने से हमें बचाने की कोशिश की
तो यार थोड़ा तो अपनापन जरूर रहा होगा॥
एक उनके दिल की हालत थी
और एक मेरे दिल की हालत थी...
वो करते थे कद्र हमारी गैरो के बीच भी
मगर हम तो बस कद्र अपनी ही किया करते थे।
माना की अहसास था इस दिल को
उस दिल की क्या हालत थी...
मगर समझते थे या नहीं वो अपने दिल को
इस बात की फ़िक्र हम भी तो किया करते थे॥
यूं महफ़िल में होकर
किसी के ख्वाबों में खो जाना...
ये तो अच्छा नहीं होता
किसी के बिना महफ़िल फिका लगने लगे।
अरे हम भी नहीं चाहते
कि किसी को ना पा पाने के बाद...
उसे किसी और के पास देख
उसकी तौहीन करने लगे॥
तो खुश रहना बढ़ के आगे
बिछड़ कर अपनी राहों में तुम...
यूं समझ लेना कि बस
इतने ही पल के लिए हमसफ़र थें दोनों।
याद रखना बस यादों को
और एहसासों को तुम भूल जाना...
जगाना इन्हें फिर से तो किसी और के लिए
शायद ना आए हम अब कभी एक दूसरे के नजर में दोनों॥
-AnAlone Krishna.
2nd July, 2019 A.D.
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