I, Krishna, present you here, my 100+ literary works—poems and stories. I hope, I shall plunder your heart by these. Let you dive into my imaginary world. I request you humbly to give your precious reviews/comments on what you read and please share it with your loved ones to support my works.

🙏🏽 Thanks...! 🙏🏿

What's new/special message for the readers...👇🏿

"Life की परछाई: Chapter 4Chapter 5Chapter 6Chapter 7 • Chapter 8 • Chapter 9" has published on 8th August, 2025. Page के सबसे अंत में UPI QR code लगा हुआ है, अगर आप मेरे काम को अपने इक्षा के अनुरूप राशि भेंट करके सराहना चाहते हो तो, आप उसे scan करके मुझे स्वेक्षित राशि भेंट कर सकते हो। जो आप वस्तु भेंट करोगे, वो शायद रखा रह जाए, परंतु राशि को मैं अपने जरूरत के अनुसार खर्च कर सकता हूँ। ध्यानवाद !
Specials
-------------------->Loading Special Works...

 मेरे इस प्रश्न को जरा ध्यान से समझने की कोशिश कीजिए-

•हम teachers को समाज का निर्माता कहा जाता है, हम कैसा समाज का निर्माण कर रहे हैं ?

- किसी गांव या मोहल्ले से जब बच्चें पढ़ने के लिए विद्यालय आते हैं, वो सगे ना सही पर रिश्ते में भाई-बहन तो होते हैं, हम उन्हें तक एक साथ एक bench पर बैठने की इजाजत अगर नहीं देते हैं, लडको की lines अलग और लड़कियों की अलग रखते हैं, कई schools में तो sections तक अलग रखते हैं, तो क्या इससे हम लड़के और लड़कियों के बीच भेद करना नहीं सिखा रहे हैं ?
- आगे चलकर इन बच्चें को समाज का एक ज़िम्मेदार और समझदार नागरिक बनने से क्या हम नहीं रोक रहे हैं ?
- वो बच्चें जो अपने भाई/बहन/दोस्त के जरिए लड़का और लड़की दोनों के perspective को समझ सकते थे, क्या हम उन्हे यह experience करने से नहीं रोक रहे हैं ?
- हमें डर हैं कि लड़के लड़कियों को छेड़ेंगे, या लड़कियां लड़कों को उकसायेंगी। पर इससे ज्यादा से ज्यादा क्या होगा ? क्या इसके बाद उन बच्चों को यह सबक नहीं मिलता कि अगर गलत करोगे तो उसका खामियाजा भुगतना पड़ेगा ?
- क्या लड़के-लड़कियों की sections अलग करने के बाद आपका यह डर समाप्त हो गया कि रास्ते में आते-जाते बच्चियां safe है ? या उनका अपने सहपाठियों से अच्छी bonding होने के वजह से उसके class के लड़के हर जगह असामजिक लोगों से लड़ने में उनका stand लेंगे ?
- क्या उन बच्चों को यह सबक सिखाना जरूरी नहीं है कि अगर कोई किसी की बहन के साथ कुछ गलत करेगा तो उसके भाई उसे घर से घसीट कर निकालकर चौराहे में खड़ा करके मारेंगे ?
- क्या लड़को को यह समझने का मौका उनसे हम नहीं छीन रहे हैं कि उनकी बहने हमेशा उनसे अपनी problems share करने में संकोच करेगी इसलिए उन्हें अपनी बहनों को और फिर बाद में अपनी पत्नी को भी यह भरोसा दिलाना होगा कि वो उनके support में खड़े रहेंगे, ताकि वो खुद को express करने में संकोच ना करे ?
- क्या लड़कियों को यह समझाना जरूरी नहीं है कि life में हर इंसान आपके बिना कुछ कहे आपकी कोई भी ख्वाहिश पूरी नहीं करे सकेगा इसलिए उन्हें खुद को express करना, खुद के लिए stand लेने के लिए सीखना चाहिए ?
- क्या लड़को को यह समझने का मौका नहीं देना चाहिए कि लडकियां लडको से सिर्फ पैसा या security नहीं चाहती, बल्की आज की लड़किया यह खुद हासिल कर सकती है उन्हें पुरुषो से सम्मान और उनसे उन्हें समझने की उम्मीद करती है ?
- क्या आप ये सब बिना लडको को लड़कियों को, और लड़कियों को लड़कों को समझने का मौका दिए सिर्फ बोल कर समझा सकते हो ?
- मैं नहीं बोल रहा कि हर bench में एक लड़की और एक लड़के को बिठाओ। पर जो जिसके साथ comfort feel करे क्या उन्हें साथ बैठने की इजाजत हम नहीं दे सकते हैं ?
- हम विद्यालयों से ही पुरुष समाज और महिला समाज को आपस में बांट कर, पुरुषो के अंदर patriarchal और लड़कियो के अंदर pseudo feminism का बीज बोकर इन दोनों के बीच खाई बनाने की कोशिश नहीं किए हैं ?
- क्या हम लड़को और लड़कियो में भेदभाव पैदा करके ऐसा माहौल का निर्माण करने में असफल नहीं हो रहे हैं कि लडकियां लडको के साथ या लड़के भी लड़कियों के साथ असहज या असुरक्षित महसूस ना करे ?
- इससे हम कैसा समाज का निर्माण कर चुके हैं कि एक ही गांव के और एक ही मोहल्ले के बच्चों एक दूसरे के माता-पिता को चाचा-ताऊ या चाची-ताई कहकर पुकारते हैं वो लड़के लड़कियां एक दूसरे के साथ बैठकर पढ़ने, सामने खड़े होने, और साथ विद्यालय आने-जाने में संकोच करते हैं ?
- क्या समाज को बिगड़ते स्वरूप के अनुरूप विद्यालय के अनुसासन नियमों को बनाकर सिर्फ समाज को सुरक्षित रख सकते हैं या समाज की आवश्यकता के अनुसार विद्यालय में ऐसा वातावरण बनाने से जिसमें लड़के लड़कियां एक दूसरे को समझकर उन्हें सम्मान देते हुए समाज और खुद को एक साथ आगे बढ़ने को प्रेरित हो, हम समाज का नवनिर्माण करके समाज को सुरक्षित कर सकते है ?

•शिक्षकों को समाज-निर्माता कहा जाता है। हमें अपनी जिम्मेदारियों को समझते हुए अपनी क्षमताओं को विकसित करके इसे पूरा करना चाहिए।

हर वर्ग, लिंग, जाती, धर्म, समुदाय, आदि के बच्चें एक दूसरे को समझे और उन्हें सम्मान करे, यह हमें विद्यालयों से ही सीखाने की शुरुआत करनी होती है। हो सकता है कि कोई मेरी बात से असहमत होंगे, किसी को मेरी बात बुरी भी लगी हो सकती है, पर मैं आशा करता हूं कि आप मेरी बातों को समझें होंगे।

-AnAlone Krishna
18th August, 2024 A.D.

0 Comments

I am glad to read your precious responses or reviews. Please share this post to your loved ones with sharing your critical comment for appreciating or promoting my literary works. Also tag me @an.alone.krishna in any social media to collab.
Thanks again. 🙏🏻

Newer Post Older Post
WhatsApp Logo
```