* क्या पता है तुम्हें *
(अपने-आप में रहकर परेशान मन को आपस में बात करके शांत करते हुए)
कृष्ण कुणाल की लिखी कविता
* क्या पता है तुम्हें *
जो खोये खोये से रहते हो तुम,
मुझसे कुछ न कहते हो तुम,
क्या पता है तुम्हें, मैं कितना तड़पता हूँ ?
कितना मैं बेचैन हो जाता हूँ...
तुम्हारी सिसकती हुई साँसों को
जब मेरी कानें महसूस करती है,
क्या पता है तुम्हें, मैं कितना तड़पता हूँ ?
कितना मैं बेचैन हो जाता हूँ...
तुम्हारी मुस्कुराहट उदासी में जब बदलता है,
खिलखिलाहट में सन्नाटा घर करता है,
क्या पता है तुम्हें, मैं कितना तड़पता हूँ ?
कितना मैं बेचैन हो जाता हूँ...
बस एक मेहरबानी तुम हुज़ूर कर दो,
बना लो मुझे अपना या खुद से दूर कर दो।
यूँही तड़पता रहूँ या फिर होऊं मैं बेचैन,
इसलिए यह तुम जरूर कर दो...
मैं डूब जाऊँ तुम्हारी ख्वाबों में,
या खो जाऊँ तुम्हारी यादो में,
इस से पहले कि मैं खुद को खो दूँ।
इसलिए यह तुम जरूर कर दो...
-AnAlone Krishna.
11th February, 2019 A.D.
बजाए इसके कि मजधार में फँसे रहो, किनारे पे आना जरूरी है।
किसी चीज को सोंच-सोंच कर अपना क़ीमती समय बर्बाद करो, इसके पहले निर्णय लेना जरूरी है।

😍😘👌
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