अनंत दर्द - कविता

Saturday, May 14, 2016 0 Comments
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.. अनंत दर्द ..

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साँसे क्यूँ चलती है,
कटती है क्यू मेरी राते।
आँशु भी ना आते है,
बस सूख जाती है मेरी आंखे।

ख्वाबों को क्यूँ बुनता हूँ,
याद आती क्यूँ मुझको यादें!
दर्द इतना ज्यादा होते कि,
आंखे मेरी रो भी ना पाते।

तन्हाइयों से मुझको भागना था,
भागना था मुझको बहूत दूर।
मुझको आके तन्हाइयों ने था घेरा,
जब चाहा था मैंने नूर।

बेबस लगता क्यू मुझको अब,
जैसे मुझसे मेरा नाराज हो रब।
लगता है जैसे गम ने हो घेरा,
और जंजीरों में पकड़े हो सब।

मत देख मुस्कान को मेरी,
देखना है तो आंखे देख,
दिल के जले चूल्हे पे,
अपनी रोटी को न सेक।

चाकू चलाया दिल पे खुद ही,
कम से कम  तू इसे न कुरेद।
पसंद आता मुझको एक ही कपड़ा,
जिसपर रंग चढ़ा हो सिर्फ सफेद।

आहें भरता हूँ मैं ठंडी-ठंडी,
पर साँसे छोड़ने को जी ना करता।
घुटन होती है जिंदगी जीने में,
जब ना मिलने पर गुस्सा आता।

क्या करूँ मैं जिंदगी जीके,
जो जिंदगी में रंग ना हो?
ख्वाब बुनूँ बेहतर करने को,
सच करने की हिम्मत ना हो।

हिम्मत मेरी होती क्यूँ ना,
ना टूटे होते अगर इतने ख्वाब।
खुश होता मैं भी दिल से,
अगर मौका दिए होते आप।

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-AnAlone Krishna.
14/05/2016

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