__________Day 52__________
● मैं परिवर्तनवादी हूँ ●मैं जिस समाज में रहता हूँ, मैं बचपन से यह देखते आया हूँ कि-
• फसल बोन से पहले आषाढ़ में प्राकृति पूजक की तरह खेतों में जाकर पूजा करते हैं, करमा, सोहराय, फगुआ मानते हैं,
• जेठ माह में शैव की तरह मंडा पूजा में शिव-शक्ति की उपासना करते हैं, मड़य में पिंड की पूजा करते हैं,
• शादी-ब्याह, दशकर्मा, गृहप्रवेश में वैष्णव की तरह ब्राह्मण से पूजा करवाते हैं,
• शाक्त की तरह काली पूजा करते हैं,
• और अब बिरसोई के जैसे टुसु, सरहुल भी मनाते देख रहा हूँ।
ये सब मुझे confuse करता है कि मैं आखिर क्या हूँ- प्राकृत, शैव, वैष्णव, शाक्त, नास्तिक-बिरसोई..?
जब मैंने समाज पर वैश्वीकरण का प्रभाव को समझा, तब मुझे समझ में आया कि प्राचीन काल से ही एक समाज का दूसरे समाज से संपर्क में आने से दोनों में एक-दूसरे का प्रभाव पड़ता आया है। जिससे उनकी संस्कृति में बदलाव होते रहे हैं, और संभ्यताएँ बनती और बदलती रहीं है। प्रकृति में विकास और गतिशीलता का अर्थ ही है समय के साथ बदलते रहना, ढ़लते रहना। फिर मुझे कोई अपने रूढ़िवादी सोंच से सभ्यता-संस्कृति को बचाते हुए दिखता है, मैं समझ सकता हूँ वो सभी परिवर्तन को रोकने का प्रयास करके प्रकृति के नियम के ख़िलाफ़ जाने की कोशिश कर रहे हैं। पर चाहे वो कितनी ही कोशिश कर लें, वो अंत में प्रकृति के समक्ष हार ही जायेंगे। कोई भी परिवर्तन को रोक नहीं सकता है।
तो ऐसे में मुझे जो जिंदगी को जीने का अच्छा तरीका लगता है, वो है धारा के साथ बहना। यानी कि हो रहे परिवर्तन को समझना और उसे accept कर लेना।
समाज में लोगों का यह एक बात अक्सर मुझे सुनने को मिलता है- "बूढ़ा-बुजुर्ग सब अगर कोई रीति-रिवाज शुरू किया है, तो कुछ सोंच के ही न किया होगा। इसलिए इसका विरोध नहीं करना चाहिए, बल्कि मानना चाहिए।"
मैं सोंचता हूँ कि मैं कौन सा मानू और कौन सा छोड़ू ? वो जो कुछ भी अन्य समाज में देखते गए, और अपनाते गए, तो आज मैं ऐसा क्यूँ नहीं कर सकता हूँ ? वो वक़्त के साथ बदलते आये हैं, तो आज मैं क्यों नहीं बदल सकता हूँ ? खैर, विवादों में ना पड़ने के लिए जो होता आया है और हो रहा है, उसे होने देना ही उचित है। पर मैं रूढ़िवादी नहीं बल्कि एक परिवर्तनवादी इंसान हूँ, इसलिए समाज में हो रहे बदलावों को स्वीकार करने और उसके अनुरूप ढलने के लिए मैं हमेशा ही तैयार हूँ।
-AnAlone Krishna.
26th April, 2023 A.D.
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