__________Day 48__________
My experience of friendship.मैं पढ़ाई-लिखाई करके अपने life में कुछ बनूँ/करूँ, इसके लिए मेरे दादा-दादी और माँ ने मेरे बचपन से आर्थिक, मानसिक, और व्यक्तिगत रूप से मेरे पीछे बहुत मेहनत की है। जिसके वजह से मैं भले ही अपनी कक्षा का एक अव्वल विद्यार्थी ना रहा हूँ, पर मेरी ज्ञान के प्रति जिज्ञासा हमेशा ही रही है। मेरी अज्ञानता का कारण जानने की इक्षा हमेशा से ही इतनी ज्यादा रही है जितनी किसी और चीज की कभी नहीं रही। और अपनी classes में ऐसे attentive रहने की वजह से कई students मेरे friends बने। सिर्फ पढ़ने और तेज बच्चे ही नहीं; बल्कि जिन्हें class में जल्दी समझ में नहीं आती थी, जो बार-बार भूल जाया करते थे, जिन्हें teachers से पूछने में डर लगता था, जो homework खुद से नहीं कर पाते थे, जो class daily नहीं आया करते थे, आदि सभी भी। पर मुझसे उनकी दोस्ती की वजह सिर्फ पढ़ाई थी। मैं class daily जाता था, homework खुद से कर लेता था, जो समझ में ना आये वो teachers से पूछ लेता था,...। जिसकी वजह से मैं उनके काम आता था। मैंने कभी किसी को खुद से चुना नहीं कि मैं किससे दोस्ती करूँगा और किससे नहीं। जिन्होंने भी मुझसे दोस्ती करनी चाही, मैंने उनसे कर लिया। जिसके बाद जिनको जब तक मेरे साथ रहना अच्छा लगा वो रहे, और जब उन्हें मुझे छोड़ने का मन हुआ तो मुझे छोड़ दिए।
मैं अपने parents का only child हूँ। इसलिए मेरे घर में मेरे साथ खेलने कूदने वाला कोई नहीं था। मैं आने घर में अकेले रहता था, एकदम alone. मेरे पास खेलने के लिए खिलौने होते थे, gadgets होते थे, मैं अपनी हर ख़्वाहिश अपनी जिद्द से पूरी किया करता था, पर मेरे अपने भाई-बहन के रूप में कोई दोस्त नहीं था। इसलिए मैं अपने cousins को, अपने friends को ही अपने भाई-बहन की तरह मानता रहा हूँ। पर उनकी अपनी एक limit रही है। उनके life में मेरे अलावा उनके खुद के भाई-बहन रहें, और भी दोस्त रहे। जिन्हें जब वो वक़्त देते, उस वक़्त मेरी अहमियत उनके life में कुछ नहीं रही। इसका अहसास मुझे हमेशा से रहा है, और मैं यह बात समझता भी हूँ। इसलिए जब मुझसे कोई दोस्ती करना चाहता तो मैं उनसे कर लेता और जब वो मुझे छोड़ते थे तो मुझे तकलीफ होती पर मैं रोता नहीं। पर अब हालात बदल रहे हैं, और अब मैं वैसा नहीं रह सकता। अब मैं हर किसी से ना ही दोस्ती करूँगा और ना ही हर किसी को वक़्त दूँगा।
बढ़ते हुए उम्र के साथ मैं समाज में हमारे प्रति लोगों की रवैए को देखते हुआ बड़ा हुआ हूँ, अपने ज्ञान के स्तर तक उन्हें समझा हूँ। जब मैं secularism और समानता के बारे पढ़ा करता था, मैं देखता था कि मेरे साथ पढ़ने वाले अधिकतम students को social culture and heredity fascinate किया करती थी। इसके साथ ही दूसरों से ज्यादा अपने वालों को बेहतर समझने की supremacy tendency भी उनमें develop होने लगी। अपना सभ्यता, संस्कृति, संस्कार है तो सबसे अच्छा है और अगर western है तो नीचा, यह भावना उनमें पनपने लगा। जिसकी वजह से अगर किसी लड़के का कई लड़कियों से दोस्ती वो देखते तो उन्हें घटिया समझते और उन्हें हेय दृष्टि से देखते। अगर लड़कियों को देखते तो वो अपनी सभ्यता, संस्कृति, संस्कार लांघने का पाप कर दी है। नहीं, वो कर सकते हैं। उनकी कइयों से दोस्ती हो सकती है। क्योंकि वो मर्यादा पुरुषोत्तम श्रीराम की तरह चरित्रवान है। दुसरो की नहीं होनी चाहिए, क्योंकि वो चरित्रहीन है। Supremacy tendency, खुद को औरों से श्रेष्ठ समझने की भावना। जब मैं individuality को जानने और समझने की कोशिश कर था तब मेरे साथ secularism और समानता को समझने वालों में से भी कुछ को छोड़कर बाकी सभी धर्म और राष्ट्र को लेकर महान गाथाएं एवं उपलब्धियों को लेकर fascinate हो रहे थे। इसमें उनको भी उतना दोष नहीं दे सकते हैं। मौजूद सामाजिक, राजीनीतिक दौर ही कुछ ऐसे है कि जिनकी भी ज्ञान को लेकर जिग्यासा और समझ वैसी नहीं जैसा मैं खुद का अनुभव करता हूँ, उनकी वैचारिक सोंच और बुद्धि उसी रूप में विकसित हो। इसलिए जब मैं इस बात को समझ रहा हूँ कि मौजूदा दौर में शिक्षित एवं ambitious युवाओं की जरूरत है कि उन्हें कोई ऐसा life-partner मिले जिनके साथ वो अपना personal, educational, financial, social and spiritual life को share and grow कर सकते। जिसके लिए उन्हें किसी के साथ time spend करने की जरूरत होती है। जिससे वो अपना knowledge, understandings, and perspectives को share करके अपने लिए एक suitable life-partner को choose कर सके। वो मानते हैं कि शादी से पहले romantic relationship में आना, gilrlfriend-boyfriend बनना गैर-समाजिक रिश्ते हैं। यह सब अनैतिक और गलत है, जो कि पाश्चात्य संस्कृति है। हालांकि ये सब वो भी करेंगे। मगर देखा-देखी में कि सब कर रहे हैं सबके girlfriend-boyfriend है तो उनकी क्यूँ नहीं है। बिना यह बात समझे कि जब आप किसी के साथ relationship में आते हो तो आपको आपको अपनी इक्षाओं, महत्वकांछाओ, आशाओं को नियंत्रण करने के लिए सीखना पड़ता है और दूसरों की respect करनी पड़ती है। आपको वो भी पसंद करना पड़ता है जो आपको नहीं पसंद पर सामने वाले को पसंद हो, आपको वो सब नहीं करना चाहिए जो आपको पसंद हो पर सामने वाले को पसंद ना हो। इससे लोगों की social life से ज्यादा personal and spiritual life में growth होती है। वो सभी secularism, individualism को बिना समझे ये सब करते हैं। जिसकी वजह से उनकी आंतरिक growth नहीं हो पाती है। बल्कि उनकी यह धारण बन जाती है कि अगर एक लड़के के life में कोई लड़की है या लड़की के life में कोई लड़का है तो वो गलत संबंध में ही होंगे। पर वो श्रेष्ठ है, supremacy। बाकी सब गलत कर रहें हैं।
School में जब किसी लड़की को मुझसे मेरे दोस्त बात करते हुए देखें, मेरे दोस्त उसे भाभी-भाभी बोलकर छेड़ना शुरू कर दिए। फिर उसके घरवालों को उसका मुझसे बात करना ऐतराज हुआ। College में classes, routine, syllabus, topics, exam dates, etc. पूछने के लिए घरवालों से छुप-छुप मुझे call किया करती थी। दोस्तो को पता चला कि कोई मुझसे बात करती है, मुझे call या text करती है तो किस्सा बना दिए। और एक नहीं बल्कि कइयों ने कइयों के साथ अलग-अलग कई बना दिए। कोई मुझे देखकर class में मुस्कुरा दी तो कई मेरे दिल में उसके लिए feelings जानने आ गई। कोई मुझे notes दी, किसी को मैंने topics समझा दिए, जिसके बदले में मैंने किसी को chocolates खिलाए या किसी ने मुझे treat दिए तो उनके भाइयों का अता-पता नहीं लेकिन lovers को problem हो गया। और जब कोई अपने career को लेकर मुझसे कोई बात करने के दौरान अपने boyfriend का incoming call काट दी तो बवाल हो गया। मगर गुनाह तो मुझसे तब हुई अगर कोई दोस्त अपना mobile मेरे पास छोड़ कर गया और बार-बार disturb करते call को receive करके मैंने बोल दिया कि "मैं अपने दोस्त को बोल दूँगा, वो बाद में call कर लेगा।"
यहाँ तक जो हुआ, वो तो फिर भी कम ही था। अब जब मेरे friends हमें अपनी शादी में invite करती है। हमारा जब उनसे intro. होता है। वो लड़ते है आपस में हमें और हमारी दोस्ती को वजह बनाकर। जो सीधा मना नहीं कर पाते वो हमें अपनी अच्छी-खुशहाल शादी को ख़राब करने का कारण बताकर। तो अब बहुत हो गया। अगर लगता है कि मैं उन लोगों की happily married life खराब कर रहा हूँ तो वो अपने life से मुझे निकाल दें। या एक बार बोल दें, मैं खुद निकल जाऊँगा। वो friends जो मेरे अब तक बने हैं, वो एक-एक करके तो मेरे life से अब कम होते ही रहेंगे। पर अब मैं हर किसी से दोस्ती आगे से नहीं करूँगा। मेरे friends मेरा चरित्र पर दाग लगा रहें हैं, ऐसे ही लगते ही रहेंगे। क्योंकि वो मेरे जैसे नहीं हैं। उनकी सोंच, उनकी समझदारी मेरे जैसी नहीं है। जिसकी वजह से आईने पर मेरे सामने खड़ा अक्स मुझसे कहता है कि मैं हूँ एक तन्हां कृष्ण, AnAlone Krishna .
मुझे इसका भी पहले से ही अंदेशा था। इसलिए मैं आज तक कभी किसी के साथ friendship से बढ़कर relationship में नहीं आया और अब भी मैं single ही हूँ। क्यूँकि मैं आज तक ऐसी किसी से मिला नहिं हूँ जिसकी समझदारी, सोंच, व्यवहार,... मेरे जैसी हो, जो मेरे दिल को भा सके। मुझे नहीं पसंद कि जो मुझे खुद नहीं पसंद वो मैं किसी और के साथ करूँ। मैं किसी की individuality खत्म करने की कशिश करूँ, personal life में उनकी मर्जी के ख़िलाफ़ झाकूँ, उसे उसकी हद समझाऊँ और अपने control में रखने की कोशिश करूँ। क्यूँकि मुझे यह बात समझता हूँ कि मुझे भरोसा रखना चाहिए कि अगर किसी को मुझपर भरोसा ना हो, मेरे साथ रहने की इक्षा ना हो तो वो मेरे साथ relationship में नहीं आना चाहेगी और मुझे भी उसे जबरदस्ती अपने साथ रोकने की कोशिश नहीं करनी चाहिए। पर मेरे जिन friends को यह लगता है कि मेरे वजह से उनके life and character पर आँच आ रहा है, उन्हें मुझे छोड़ देना चाहिए। अगर उन्हें लगता है कि मैंने उनका भरोसा break किया है तो, I cant deserve their friendship. So, they must leave me. मैं किसी को भी रोकने की कोशिश नहीं करूँगा।
मुझे उनके friendship से अनुभव जितना भी मिला, मुझे उससे बहुत कुछ सीखने को मिला। और जितना भी मिला, काफी है। पहले जब लोग मेरे सामने अपनी achievements गिनवाते थे और मुझे looser feel करवाने की कोशिश किया करते थे, मैं अंदर ही अंदर मुस्कुराता था। मुझे घमंड होता था कि they have achievements but I have friends. Who are achievement of my character. But अब मेरा यह घमंड टूट रहा है। अब मुझे समझ आ रहा है कि इनकी भी अहमियत उतनी नहीं life में। इसलिए अब मैं सिर्फ उसे हासिल करने की कोशिश करूँगा जिससे मेरा life meaningful बन सके। अब मैं किसी भी temporary चीज को अहमियत नहीं दूँगा। अब भले मैं पहले की तरह अच्छा किसी को अच्छा ना लगूँ। मुझे अब इसकी परवाह नहीं।
-Krishna Kunal
5th January, 2023 A.D.

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