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"Life की परछाई: Chapter 4Chapter 5Chapter 6Chapter 7 • Chapter 8 • Chapter 9" has published on 8th August, 2025. अगर आपको online reading में असुविधा होती है, और आप इसे printed form में पढ़ना चाहते हो, तो post के bottom में दिए 'Download and Print' button को click करके आप उसका printout करवा लेना। जिसमें 'Download and Print' button नहीं है उसके लिए आप 'Google form' को भरकर मुझे send कर दो, मैं आपको pdf भेज दूंगा। इसके अलावा सबसे अंत में UPI QR code भी लगा हुआ है, अगर आप मेरे काम को अपने इक्षा के अनुरूप राशि भेंट करके सराहना चाहते हो तो, आप उसे scan करके मुझे राशि भेंट कर सकते हो। जो आप वस्तु भेंट करोगे, वो शायद रखा रह जाए, परंतु राशि को मैं अपने जरूरत के अनुसार खर्च कर सकता हूँ। ध्यानवाद !
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Day 81 | Diary of AnAlone Krishna

__________Day 81__________
आज मैं दो सपना देखा- 
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"मरियल सा जिंदगी, बेजान-उदास, शारीरिक नहीं बल्कि मानसिक तौर पर, ऐसे मर मर कर जीने से अच्छा है कि इंसान मर ही जाए।"

मैं satire मार रहा हूँ, अपनी नींद में, classroom में दाहिने side के row में बैठी दो लड़कियों को।

क्या मैंने कोई गलती की है, या मेरा subconscious mind में यह चीज बैठ ही नहीं पा रहा है कि अब कोई possibility नहीं है। मुझे याद नहीं कि मैं कभी ऐसा था, पर मैं अपने dream में आज भी उसपर अपना impression झाड़ने में लगा हुआ हूँ। जब मैं अपने school के classroom के setup में होता हूँ और मेरे सपनो में वो आती है।

और क्या मैं वैसा था ? मेरे classmates मुझसे डरते थे ? मैं जब bench के बीच से गुजर रहा था तो कुछ classmates ऐसे बगल में झुक जा रहे हैं सपने में जैसे कि मैं अभी कहीं उन्हें एक हाँथ मार ना दूँ।
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Dream 2-

शाम के समय के जैसे चारों ओर हल्की deam light थी, पहाड़ी मौसम की तरह हल्का मद्थम बारिश हो रहा था। कोई पहाड़ी इलाके का शहर था, वहां किसी school का promotion में tournament आज होने वाला था। 9th-10th class के बच्चे दौड़ते हुए सीढ़ियो से नीचे उतर रहे थे। मैं भी लड़के के साथ गिरने से बचते हुए, दौड़ते हुए, दोस्तों के साथ सीढ़ियो से नीचे उतर रहा था।

मेरे pocket से कागज का एक टुकड़ा गिरा, मै उसे उठाने के लिए रुका तो मेरा अपने दोस्तो से हाँथ छूट गया। वो पीछे मूड कर मुझे देखे, फिर मुड़ कर मुझे छोड़ कर दौड़ते हुए आगे निकल गए। मैं झुक कर जैसे ही उस कागज के टुकड़े को छुआ तो कोई कोमल हाथों वाली लड़की मेरी हथेली को पकड़ ली। और मुझे अपने साथ खींचते हुए अपनी सहेलियों के बीच दौड़ते हुए सीढ़ियों से नीचे उतरने लगी। मैं पीछे मूड कर देखा, यह वही थी। मैं हाँथ थामे हुए ही वापस पीछे कुछ सीढ़ियां चढ़कर कागज के टुकड़े उठाने के लिए मुड़ा। वह मेरा हांथ कस कर पकड़े हुए थी, इससे उसका हांथ उसकी सहेलियों से छूट गया।

मैं उसे खींचते हुए कुछ सीढ़ियां ऊपर चढ़ने लगा। वह मेरा हांथ कस के पकड़ी रही और अपनी सहेलियों की ओर देखी। 
उसकी सहेलियां उसे चिल्लाते हुए बोली, "एलिज़ाबेथ चलो, नहीं तो अच्छी seat नहीं मिलेगी।" 
पर वो उन्हें मेरे साथ पीछे खींचती हुई जवाब दी, "तुम चलो मैं कृष्ण के साथ पीछे आती हूं।" 
मैं वापस जाकर उस कागज के टुकड़े को उठाया और उसके साथ एक लंबी सांस लेकर दौड़ते हुए सीढ़ियों से नीचे उतरने लगा। वह मेरा हांथ थाम कर दौड़ती हुई मेरे साथ उतर रही थी, और मैं सिर्फ उसे देखते हुए उसके साथ सीढ़ियों से नीचे उतर रहा था। हर तरफ़ school का banner लगा हुआ था - "KV Modal विद्यालय" शायद कोई बड़ा event था।

हम नीचे ground में उतरे, वह मेरा हांथ छोड़ते हुए बोली, "अब जाओ दोस्तों के साथ match खेलो।" 
मैं उसे मुस्कुराकर कहा, "मुझे खुद छोड़ आओ।" 
वह मेरा हांथ पकड़कर ground के बीच से, जहां लड़के fielding तैयार कर रहे थे, मुझे ले जाकर मेरे दोस्तों के पास छोड़ आई। 3-4 दोस्त मुझे मुस्कुराते हुए देख रहे थे, एक नाराजगी भरे नजरों से और एक गुस्से से। 
जो गुस्से में था वो बोला, "आजकल तुम उसको कुछ ज्यादा ही time नहीं दे रहा है ?" 
मैं अपने उस दोस्त के बाहों को पकड़कर उसे दबोचते हुए बोला, "मै किसको कितन time दे रहा हूँ इससे किसी को क्या फर्क पड़ना चाहिए ? मैं तुम्हें उतना time अगर नहीं देता हूँ, जो तुम्हारे हिस्से का है, जब तुम्हें मेरी जरूरत महसूस होती है और मैं नहीं होता हूं, तो तुम कहो।"
मेरा नाराज दोस्त बोला, "हाँ आजकल तुम हमारे साथ कम ही रहते हो।"
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-AnAlone Krishna
14th September 2025 A.D.

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