अधि + आत्मन्
खुद की चेतना जब नहीं होता है तो कोई भी इंसान के मन को बहका देता है। तभी तो जो इंसान पहले supportive लगता था, बाद में निकम्मा लगने लगता है।
मैं समझ सकता हूँ कि एक ने कितने ताने सहे होंगे समाज के तब वह supportive बना होगा, और क्यों दूसरा से सहा नहीं गया होगा उसको support करने वाले का निकम्मापन।
जब आप struggle करोगे अपने पैरों पर खड़े होने का, समाज से आपको लड़ना होगा, आपमें वो सहनशक्ति पैदा हो जाएगी कि आप समाज की बातों को सह सको और बेवजह उनसे उलझकर अपना समय बर्बाद ना करो।
पर वहीं जिनके लिए समाज से कोई और लड़ते है support बनकर, उनके अंदर समाज की बातों को सुनकर बर्दास्त करने की क्षमता विकसित नहीं होती है। इसलिए वो criticism/satire बर्दाश्त नहीं कर पाते, उन्हें बस अपने बारे में अच्छा सुनना पसंद होता है, और वो कामयाबी का मतलब सिर्फ अपनी achivement को समझते है।
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