लोगों को लगता है कि हम किसी को gifts देखर अपने अपनों की गलतियां मनवा सकते हैं। हमारे बचपन से यही करते आये है- जब भी हमारा झगड़ा होता, हमें chocolates देकर, गले लगवा कर सोंचते थे कि हमारे बीच सुलह हो गया।
जबकि reality कुछ और ही होता था। उस वक़्त तो हम शांत हो जाते थे, लेकिन हमेशा इस संदेह में रहते थे कि पता नहीं कब वो फिर से झगड़ा करेगा। इसके ताक में रहकर कभी कभी हम खुद ही पहले शुरू हो जाते। Gifts के लालच में हमें शांत रखने की कोशिश करते थे। उन्होंने इस बात को कभी नहीं समझा कि उन्हीं gifts के कारण हमारे बीच की आपसी jealousy, आपसी मतभेद, आपसी घृणा और बढ़ती चली गई। उन्होंने ना हमारे situations को समझा, ना ही हमें।
Gifts ना ही गलतियों पे पर्दा करता है, ना ही सुलह करवाता है। वह सामने दिख रहे झगड़े को cold war में बदल देता है।
हमारे रूढ़िवादी सोंच के साथ पले-बढ़े parents हमें नासमझ और मूर्ख समझते हैं। इस बात को नहीं समझते कि जबसे हमने पढ़ना शुरू किया, सीखना शुरू किया, हमारी खुद की सोंचने-समझने की छमता develop होना शुरु हो गई।
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