पता है ?
लोग जिनकी परवाह नहीं करते ना, उनकी तरफ देखना भी अपना वो time waste समझते हैं।
जो लोग मुझे criticize करते हैं, वो मेरे अंदर के खामियों को सामने लाकर मुझसे मेरी गलतियों को सुधरवाने में जो अपना कीमती वो वक़्त देते हैं, कहीं ना कहीं वो मेरी कद्र और फिक्र करते हैं। इसलिए मुझे मेरे उन विरोधियों पर भी प्यार आता है।
अब ऐसे में कोई धर्म, जाती, समुदाय,संस्कृति मुझे किसी और से नफ़रत करना सिखाए, मैं उसे पसंद कैसे कर सकता हूँ ? मैं उसे सही कैसे मान सकता हूँ ?
मैं भी सही करना चाहता हूँ, वो भी सब सही ही चाहते हैं। जब दोनों एक ही चीज को चाहते हैं। तो फिर मैं उनसे नफरत कैसे कर सकता हूँ ? और जो ऐसा करने को बोले, उन्हें मैं सही कैसे मान सकता हूँ ? मैं उसे धर्म-संगत कैसे मान सकता हूँ ?
-कृष्ण
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