By AnAlone Krishna
Chapter 10
Prelude | Chapter 1 | 2 | 3 | 4 | 5 | 6 | 7 | 8 | 9 | 10 | 11 | 12
10.2 : Individuality of Personal Choices
10.3 : Individuality of Personal Role
10.5 : Individuality of Personal Freedom
● Life की परछाई ●
Chapter 10.1 : Individuality of Personal Experience
शाम हुआ, अभिषा के पिता घर आए। अभिषा की माँ आंगन में बैठ कर अभिषा के भाई के साथ पकौड़े खा रही थी। वह उनको बताई कि "आज फिर आशा पूर्वी के घर गई थी, और वापस आकर रोते-रोते सो गई। जाइए उठाइए नहीं तो खाना भी नहीं खाएगी।" क्या अभिषा की माँ उसको प्यार नहीं करती थी, सिर्फ अभिषा के पिता ही उसे प्यार करते थे ? नहीं ऐसा नहीं है। आमतौर पर जैसे बेटियों को अपने पिता से और बेटों को अपनी माँ से ज्यादा लगाव होता है। अभिषा का भी जिद्द, प्यार सब उसके पिता के सामने था। वह अपनी माँ के कहने पे ना ही कभी चुप होती और ना ही अपनी कोई जिद्द छोड़ती थी। बस वह अपने पिता की बात सुनती थी। अभिषा के पिता कमरे में गए, और अभिषा को अपने गोद में उठाए। वह उनके कंधे से लिपट गई, फिर वह उसे आंगन के किनारे ले गए। अभिषा का भाई लोटे में पानी ले आया। वह उससे अभिषा के चेहरे को धोए। फिर वह उसे उसकी माँ के पास ले गए, उसके सामने बिठाए, वह एक पकौड़ा उठाकर अभिषा को खिलाते तो दूसरा पकौड़ा अभिषा खुद खाती।
आप सोच रहे होगे कि अभिषा की तो शादी भी हो गई, उसके बच्चे भी है, कहीं आप गलती से पीछे का chapter तो दोबारा नहीं पढ़ने लगे। पर नहीं, कृष्ण जो अभिषा के albums की sketches के through आपको कहानी बता रहा है, उसमें कुछ moments ऐसे थे जिन्हें तस्वीरों में capture ना करने की वजह से वह छूट रहे थे। कुछ ऐसे moments थे जो अभिषा और उसके परिवार के लिए तो अहमियत रखते हैं, पर अभिषा को इसका अहसास नहीं है इसलिए वह इन्हें अपनी यादों में संभाल के नहीं रखी है। और Krishna इस बात को लेकर confuse है कि वो उन्हें explain कैसे करे। क्योंकि उन moments के snapshots अभिषा के albums में भले ही नहीं है, पर उन लम्हों की सबक और सीख जो उसके जीवन को पहले कभी प्रभावित किए, वो अभिषा और उन सभी characters के actions और life में आज दिखता है। कृष्ण यह कहानी अभिषा के सिर्फ life के किस्सों को सुनाने के लिए नहीं लिख रहा है, बल्कि वह उसके माध्यम से उसके life lessons, inspirations, motivations, ethos, observations, ideologies, concepts, thoughts, visions, perspectives, etc. को explain करने के लिए लिख रहा है। इसलिए जब कहानी को मैं यानी कि समय सुना रहा हूँ तो कृष्ण जिस तरह से story को बताया है, उससे थोड़ा सा हटकर मैं अपने हिसाब से सुनाऊंगा, शुरू से अंत की ओर नहीं, बल्कि उन lessons को एक-एक करते हुए, समझाते हुए, जो जरूरी है। ताकि Krishna के लिखे इस story में जो concepts/ideas/messages है, और साथ ही ये सारे chapters एक साथ आपस में मिल कर जो किसी grand perspective/lesson/thought को explain करते हैं, वो आपको अच्छे से समझ आ सके। खैर, जो वर्तमान समय है, वह अभिषा और उदय के बच्चों का समय है। और अभिषा, जो कि अपने life की परछाई, अपने albums के snapshots को पलटते हुए बीते वक्त को याद कर रही है, उसकी यादों के जरिए उसे और उसके परिवार के morals, parenting, characters को कृष्ण हमें समझाने की कोशिश कर रहा है।
पकौड़ी खाने के बाद अभिषा और उसका भाई दोनों अपना हाँथ-पैर धोकर school bag लाने के लिए गए। अभिषा की माँ अभिषा के पिता से बोली, "आशा को कुछ समझाते क्यूँ नहीं हैं ?"
अभिषा के पिता पूछे, "क्या समझाना है ?"
अभिषा की माँ बोली, "बड़े भोले बन रहे हैं, ऐसे जैसे कि कुछ जानते ही नहीं है। आशा बार-बार पूर्वी के घर जाती है। उसके घरवाले इसको पसन्द नहीं करते हैं। पूर्वी की माँ लोगों को आशा के बारे में उल्टा-सीधा बोलती है। कहती है कि यह लिच्चड़ जैसा बार-बार उसके घर जाती रहती है। मेरी बात तो कभी यह सुनती नहीं है। आप समझाइए इसको।"
अभिषा के पिता पूछे, "मैं समझाऊँ ? पर कब तक ?"
अभिषा की माँ बोली, "कब तक क्या ? आपकी बात कभी टालती नहीं है, आप एक बार कहिएगा और यह मान जाएगी।"
अभिषा के पिता बोले, "हमारे दोनों बच्चे बड़े हो रहे हैं, और इनका सोचने-समझने, तर्क करने की बुद्धि का विकास हो रहा है। अगर मैं इन्हें कोई गलती करने से पहले ही रोक दूँ, तो वो अनुभव जो इन्हें उससे मिलेगा, वो कभी मिलेगा ही नहीं। यह सिर्फ इन्हें दिखाए गए दिशा पर चलने का आदत दिलाएगा, इन्हें तर्क करके सही और गलत का चुनाव करना नहीं सिखाएगा।"
अभिषा की माँ बोली, "क्या सही और क्या गलत ? यह बार-बार उसके घर जाती है, और जलील होकर आती है। इसके साथ ऐसा होने देना, आपको गलत नहीं लगता है ? आपको दिखता नहीं है कि इसको तकलीफ हो रहा है इससे ?"
अभिषा के पिता बोले, "तो होने दो, इससे यह strong बनेगी।"
अभिषा की माँ बोली, "कैसे पिता है आप ? जो आपको अपनी बेटी का दर्द दिखता नहीं है ?"
अभिषा के पिता बोले, "देखो, जब कोई बच्चा अपनी आँखें खोलता है, उसे कई रिश्ते खून से जुड़ा मिलता है। उसे वह रिश्ते और उसकी अहमियत समझ नहीं आता है। वह यह नहीं समझ पाता है कि रिश्ते उसके व्यवहार और आचरण की वजह से strong बनते हैं और कायम रहते हैं। जिसके कारण वह गलतियां करता है। वह अपने अहं को बड़ा बना लेता है, अपने क्रोध के परिणामों की फिक्र नहीं करता है। उसकी ईर्ष्या के कारण वह दूसरों से हिसका(देखा-देखी/नकल) करने लगता है, और सबकुछ पाने के चक्कर में दूसरों के साथ बांटना नहीं सीख पाता है, किसी के लिए कुछ छोड़ना नहीं सीख पाता है। वह अपने अंदर के कमी को स्वीकार नहीं कर पाता है, ढीठ बना रहता है। जिसके कारण धीरे-धीरे उसके रिश्तों में दरारें आने लगती है, और लोग उसे छोड़ने लगते हैं।"
अभिषा की माँ बोली, "पर यह तो आप आशा को बातों से भी समझा सकते हो जैसे मुझे समझा रहे हो। जो आप उसे यह खुद से समझाने के लिए बार-बार पूर्वी के घर जाने और जलील होकर रोते हुए वापस आने दे रहे हो, उसे रोकने के लिए कुछ नहीं कर रहे हो; क्या लगता है, वह इतनी बड़ी हुई है अभी, कि वह खुद से यह बात सीख पाएगी ?"
अभिषा के पिता कहते हैं, "नहीं वह सिर्फ इस अनुभव से नहीं सीख पाएगी। इस पाठ को खुद से समझने की उसकी अभी क्षमता नहीं है। पर अगर सिर्फ बातों से उसे यह पाठ समझाया जाए, तो वह इससे भी नहीं समझेगी। उसका खुद का अनुभव और हमारी दी हुई सीख, दोनों होगा तब वह इस पाठ को उतार पाएगी।"
अभिषा की माँ बोली, "उसे रिश्तों को संभालना सिखाना है तो जब वह अपने भाई से झगड़ती है, तब आपको यह सीख देना था ना। किसी गैर घर की लड़की, वो जिंदगी में रहे या ना रहे, इससे क्या फर्क पड़ता है ! आशा उसे खोने से कैसे सीखेगी ?"
अभिषा के पिता कहते हैं, "दोस्ती एक ऐसा रिश्ता है जो कि खून/किस्मत की वजह से नहीं बनता है, बल्कि इंसान उसे खुद से अपने पसंद के हिसाब से चुन सकता है। जिस रिश्ते का हमें चुनाव करने का हक नहीं होता है, उसे हमें खोने का भी डर नहीं होता है। पर जहां हम किसी के साथ रहना चुनते हैं, तो चाहते हैं कि वो भी हमारे ही साथ रहना चुने। हमें छोड़कर उसका किसी और को चुनने का डर हमें हमेशा रहता है। इसी वजह से हम कोशिश करते हैं खुद को बदलने की, कि उसे भी हम पसंद आए। ताकि वह हमें ही चुने, वह हमें छोड़कर किसी और को ना चुने, और इस प्रक्रिया में हर इंसान बेहतर बनता चला जाता है। आशा जानती है कि वह आशु(आशुतोष) से चाहे दिन-रात जितना भी झगड़ा कर ले, उन्हें साथ ही रहना है। इसलिए ये दोनों एक दूसरे के लिए शायद खुद को ना बदले। पर पूर्वी को खोने का डर और यह अहसास, आशा में बहुत बदलाव लाएगा।"
और यह हुआ भी। वक्त के साथ अभिषा यह भी सिख गई कि, "जो आपके लिए कुछ नहीं करते हैं, उसके लिए भी कैसे किया जाता है, selfless होकर, बिना किसी expectations के।" इसी कारण जब पूर्वी को वो लड़के college में तंग कर रहे थे (ref. Chapter 3), उस time उनके बीच दोस्ती ना रहने के बावजूद भी अभिषा और सलोनी पूर्वी के लिए लड़ गई थी। खैर, यह तो बहुत बाद की बात हो गई, फिलहाल यह भी बताना बाकी है कि जिस उम्र में अभिषा के पिता अभिषा को उसके अनुभवों से सीखने में मदद कर रहे थे, उस वक्त पूर्वी के पिता पूर्वी का किस तरह परवरिश कर रहे थे।
शाम में अंधेरा धीरे-धीरे होने लगा। अभिषा की माँ लालटेन जलाकर, ले जाकर अभिषा के table के पास रख दी।
-----Transition 1
लालटेन के पास बैठ कर पढ़ाई कर रही पूर्वी जब अपने पिता के घर वापस आने की आहट सुनी, तो वह लकड़ी के बने कुर्सी में झूलते अपने पैर के सहारे नीचे उतरी और वह उत्साह से अपने पिता के पास जाने लगी। वह जब जिस कमरे में पढ़ाई कर रही थी उस कमरे से आंगन में निकलने के लिए दरवाज़े के पास पहुंची, तो वह अपने माता-पिता की बातें सुनी, जो वो आपस में कर रहे थे।
पूर्वी की माँ पूर्वी के पिता का दरवाजे के पास हांथ पैर धुलवाते हुए, उनके सामने लोटे से पानी गिराते हुए बोली, "आज अभिषा फिर आई थी हमारे घर। आप उसके बाप को कुछ बोलते क्यूँ नहीं हो ?"
पूर्वी के पिता पूर्वी की माँ को घूरे।
पूर्वी की माँ आगे बोली, "कैसी ढीठ लड़की है, जब उसको हर बार मिलने नहीं देती हूँ फिर भी मुँह उठाकर चली आती है हर बार।"
पूर्वी के पिता बोले, "पूर्वी उसकी सहेली है।"
पूर्वी की माँ बोली, "दिक्कत उससे नहीं है। उसका संगत किनसे है, वो जड़ है। वो पिछड़े बच्चियों के साथ भी खेलती-कूदती है, जो साफ-सुथरे नहीं रहते हैं। उन बच्चों में ना तो तमीज होता है और ना ही बात करने का लहजा। उनके संगत में हमारी पूर्वी का भी जुबान और बुद्धि खराब हो जाएगा। उनमें संस्कार भी नहीं होता है, जो अपने घर के मान मर्यादा का ख्याल रखे। बड़े-बुजुर्गों की सुनते नहीं है और बड़े होकर घर से भाग जाते हैं।"
पूर्वी के पिता बोले, "पूर्वी तो उन नीचे घर वाले लड़कियों के साथ नहीं रहती है ना ?"
पूर्वी की माँ कहती है, "नहीं। मगर आप पूर्वी का नाम कटवा कर बालिका विद्यालय में क्यों नहीं लिखवा देते हो। लड़कों के साथ पढ़ने का झंझट ही खत्म हो जाएगा।"
पूर्वी के पिता कहते हैं, "वहाँ क्या वो भ्रष्ट लड़कियां नहीं होंगी इसके साथ ? इसी स्कूल में अच्छा है, कम से कम इसका भाई इसपर नज़र तो रखता है।"
पूर्वी की मां कहती है, "पर अगले साल के बाद तो बाबू वहां से निकल जाएगा ना। फिर तो पूर्वी का मनमानी हो जाएगा स्कूल में।"
पूर्वी के पिता कहते हैं, "छोटन का लड़का है ना। अपनी बड़ी बहन का इतना तो ध्यान रख ही सकता है।"
यह सुनकर उस बड़े से अंधेरे कमरे के कोने में मौजूद table के सामने पूर्वी वापस उस लकड़ी के कुर्सी में चढ़कर बैठ जाती है। अपने हांथ में कलम को थामे, उदास। उस table पर रखे लालटेन की रोशनी उसके सामने रखे किताब और कॉपी से टकराकर उसके चेहरे पर पड़ रहे थे। यूं तो पूर्वी की निगाहें नीचे कताबों पर तो थी, पर ध्यान कहीं और। Individuality, जब तक वह अपनी जरूरतों के लिए अपने परिवार पर निर्भर है, उसकी कोई individuality नहीं है। उसका परिवार जो चाहेगा, जो कहेगा, उसे वही करना पड़ेगा। इसलिए उसे मन लगाकर पढ़ाई करना होगा, life में कुछ बन कर दिखाना होगा। ताकि जब वह अपना नाम कमाएगी, उसका खुद का पहचान होगा, तब जाकर शायद उसकी individuality को भी अपनाया जाएगा। और वह बड़ी होकर इसमें सफल हुई या नहीं, यह तो आपको मैं पहले बता ही चुका हूँ। (Ref. Chapter 6)
वह लालटेन की रोशनी में मन लगाकर पढ़ाई करने की कोशिश करने लगती है।
----->Transition 2
लालटेन को घेरे चटाई में मोहल्ले के कुछ बच्चे सलोनी के साथ पढ़ाई कर रहे हैं। सलोनी को पढ़ते और पढ़ाते देख उसके पिता अंदर ही अंदर proud feel कर रहे थे। वो याद करते थे अभिषा के पिता की बात को, जब उन्हें समझाए थे कि, "बच्चों को अनुभव नहीं होता है, ज्ञान नहीं होता है, तो वो गलतियां तो करेंगे ही। समझदारी की उम्मीद तो हम बड़ों से होती है। पर हम भी यह नहीं समझेंगे कि उनकी गलती का कारण उनके अंदर ज्ञान और अनुभव का अभाव है, और हम उन्हें कोई अनुभव ही नहीं करने देंगे; तो उनके जिंदगी में सुधार कैसे आएगा ? बजाए इसके कि तुम सलोनी पर गुस्सा करो, उसे control करने की कोशिश करो; उसे सही और गलत को सीखने में मदद करो। इससे वो जायदा समझदार बनेगी।" जब सलोनी के बारे में पहली बार अफवाह उड़ा था और उसके पिता गुस्सा हुए थे। (Ref. Chapter 2) उसके पिता जब आज सलोनी को देखते है, उसे बातें करते देखते हैं, छोटे बच्चों को समझाते हुए सुनते हैं तो वह हर एक moment उसपर proud करते हैं। वो देखते हैं कि सलोनी अपने छोटे-छोटे actions की भी काफी परवाह करने लगी है, क्योंकि वो जिन बच्चों को पढ़ाती है, वो बच्चे उन्हें नकल करते हैं। वो जब बच्चों को कुछ समझाने की कोशिश करती है और बच्चे नहीं समझते हैं, तो वह खुद पहले बेहतर तरीके से समझने की कोशिश करती है ताकि वह फिर बच्चों को दोबारा समझाने की कोशिश कर सके। कहते हैं कि गरीब घरों के बच्चे अपने उम्र से पहले बड़े हो जाते हैं। सलोनी को भी समझदारी की बातें करते देख उसके पिता अंदर ही अंदर उसपर proud करते थे।
सलोनी को अहसास हुआ कि उसे कोई शायद पीछे से देख रहा है। वो चटाई में घुटनों के बल बैठकर बच्चों को समझाते हुए ही अपने पीछे मुड़ी, उसके पिता उसे दरवाजे के पास खड़ा होकर देख रहे थे। वह उन्हें बोली, "आपको कुछ चाहिए था पापा ?"
उसके पिता बोले, "नहीं, तुमलोग पढ़ाई करो।" और वो चले जाते हैं।
-----Chapter partitioned due to its large length.
Continue your reading in this chapter.-----
Published on 8th August, 2026 A.D.
previous chapter | Preface & Index Page | next chapter
Prelude | Chapter 1 | 2 | 3 | 4 | 5 | 6 | 7 | 8 | 9 | 10 | 11 | 12
Comments
Post a Comment