• पहली दिल्लगी - गुमसुम जिन्दगी और अंत •
(प्यार की खोने के बाद भी जिन्दगी जीने के आदत के साथ)
कृष्ण कुणाल की लिखी कविता
*पहली दिल्लगी-गुमसुम जिन्दगी और अंत*
कई रंग धुल रहे हैं आँखो से,
वो मिठास जा रहे हैं बातो के ।
ना अब शाम का इंतजार रहता है,
ना अब कल मिलने का आस रहता है ॥
जी रहा हूँ जिन्दगी अपनी बेरंग करके,
मैं अपनी जिन्दगी के सारे मिठास खो करके ।
हैं नये-नये से लगते ये चीजें सारे,
है कुछ भी नही, जो कल तक थे अपने हमारे ॥
ना आस रहा, ना प्यास रहा,
हाँ थोड़ा महबूब की बाँहो में रास रहा ।
ऐ जिन्दगी, कुछ खोने का गम नही मुझको,
तू जैसा भी रहा बिलकुल झक्कास रहा ॥
अब अंतर करना मुश्किल है मेरे लिए,
क्या महज सपना है और क्या हकीकत ।
जब भी खुद को देखता हूँ मैं तो दो रूपो में,
बस यही बन रहा है मेरी मुसीबत ॥
लगता है अंदर ज्वालामुखी है,
और बाहर से बिलकुल शांत हो गया हूँ ।
मुझे जितना कोसना है, कोसते जाओ,
मैं नदी को समाहित करने वाला समंदर हो गया हूँ ॥
महसूस है मुझे कि तू खुश नही, ऐ जिन्दगी,
ना उसे अब कभी शायद भूल पाऊँगा ।
अब मुझे मेरी मंजिल कभी मिल भी जायेगी,
तो अपनी खुशिया बाँटने के लिए तन्हा रह जाऊँगा ॥
-AnAlone Krishna.
17/07/2017
This is last edition of this poetic album, 'पहली दिल्लगी' ।






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