Day 83 | Diary of AnAlone Krishna

Wednesday, September 24, 2025 0 Comments

 __________Day 83__________


समाज कहने का अर्थ सिर्फ मैं नहीं समाज में मेरे अलावा और 99 लोग है। मैं जब समाज की बात करता हूँ, तो समाज में पूरे 100 लोगों की बात करता हूँ। मैं अगर समाज के लिए किसी चीज की मांग करूंगा, तो मैं अकेले के लिए नहीं बल्कि पूरे 100 लोगों के लिए करूंगा। तो देने वाला यह जरूर देखना चाहेगा कि जिस चीज का मैं मांग कर रहा हूँ, वो मेरे अलावा क्या बाकी 99 लोग भी अपनाना चाह रहे हैं। अगर 20 लोग अपनाना चाहेंगे और 80 लोग अपनाना नहीं चाहेंगे तो समाज को वह नहीं मिलेगा जो मैं अपने समाज के लिए मांग कर रहा हूँ।


मैं शिक्षा, स्वास्थ, रोजगार के अवसर, समानता, न्याय, इत्यादि की मांग करता हूँ। मेरे अलावा और बाकी कुछ ही लोग यह इस समाज के लिए चाहते हैं।
बाकी लोगों को फर्क नहीं पड़ता है कि उनके गांवों में बने school की buildings अधूरा है या जर्जर है, उनमें योग्य और प्रशिक्षित शिक्षकों की कमी और जरूरत है, हर बिना शिक्षकों के उनके बच्चे कैसे pass हो जा रहे हैं, बच्चे 8,9,10 में पहुंच जाते हैं पर उन्हें किताब पढ़ना और लिखना नहीं आता है। उन्हें बस यह चाहिए कि उनके बच्चों को विद्यालयों में मध्याह्न भोजन मिलता रहे, scholarship मिलता रहे, dress मिलता रहे, बाकी matter नहीं करता है उनके लिए। इसलिए उन्हें योग्य, कर्मठ और कर्तव्यनिष्ठ सरकार की जरूरत नहीं है, बस किसी ऐसे की जरूरत है जो उन्हें मिल रहा आरक्षण और सरकारी लाभ, इत्यादि हितों की रक्षा करे। उन्हें प्रशिक्षण संस्थानों और केंद्रों की जरूरत नहीं है, वो अपनी पूरी जिंदगी झोपड़ियों में रहकर और जंगलों में शिकार करके बीता लेंगे। उनके अड़ोस-पड़ोस रहने वाले भाई-बंधु अधिक लागत लगाकर सस्ते दाम में अपना उपजाया हुआ अनाज बाजार में खराब होने डर से और उनके क्षेत्र में भंडारण की व्यवस्था ना होने के कारण बाजार में बेच कर आते हैं। इससे उन्हें क्यों फर्क पड़ेगा, यह उन्हें घरों की बात थोड़ी है ! उन्हें सरकार मुफ्त में तो राशन दे ही रही है, बस उन्हें सरकार हमेशा ऐसा ही चाहिए जिससे यह उन्हें हमेशा मिलता रहे। रोजगार के अवसर की जरूरत उन्हें नहीं है, उन्हें किसी के साथ प्रतिस्पर्धा नहीं करना है, जितना है उतना में वो संतुष्ट है। हां, सरकारी नौकरियों में आरक्षण उन्हें जरूर चाहिए ताकि वो और उनके बच्चे ना सही पर उनके जाती का कोई जाकर ऊँचे पद में बैठे, जिनका नाम लेकर, और जिनसे अपना पहचान जोड़कर वो गर्व कर सके। और उनके जाती का कोई व्यक्ति कैसे उनसे ज्यादा इतना शक्षम या काबिल बन पा रहा है कि वो उस पद में उनसे ज्यादा खुद का दावेदारी करता है, ये सब जानकर उन्हें क्या करना है ! स्वास्थ चिकित्सा सुविधाएं, इनकी जरूरत उन्हें नहीं है, इसके लिए उनके देव-भूत है ना, कोई भगत-भगतैन, तांत्रिक, इत्यादि जादू-टोना कर देगा आकर घर में, सब समस्या का उससे समाधान हो जाएगा। ये मानसिक चिकित्सा क्या होता है, लोगों में भूत चढ़ता है, कोई नजरता है, कही जाकर गछ देता है, इसके वजह से उनके मन, तन और घर में अशांति होती है।

इत्यादि...
जो मैं समाज के लिए मांग करता हूँ ना वो उन्हें चाहिए ही नहीं, वो इनकी जरूरत महसूस नहीं करते हैं। तो बेहतर मेरे लिए यह होगा कि वो लोग, जो मेरे साथ अपने पारिवारिक स्थिति को सुधारना चाहते हैं, मैं उन्हें लेकर कोई अन्य योजना बनाऊं। मैं इस समाज के लिए कोई मांग ना करूं, बल्कि उन्हें जो चाहिए उन्हें उसमें खुशी-खुशी उन्हें रहने दूँ।

-Krïshnä Künäl
24th September, 2025 A.D.

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