सम्मान किसी जाति, धर्म, सांप्रदायिकता, सामाजिक आधार पर नहीं मिलता है बल्कि व्यक्ति के कर्मों के आधार पर प्राप्त होता है। बचपन में पिता के कर्मों के आधार पर संतान को सम्मान प्राप्त होता है, जवानी में व्यक्ति के स्वयं के कर्मों के आधार पर सम्मान प्राप्त होता है, और बुढ़ापे में उसके संतानों के कर्मों का फल प्राप्त होता है।
पूरा बचपन आपका कैसा बीता, इसपर आपका नहीं बल्कि आपके परिवार का कर्मफल आपको मिला है। पर अगर जवानी में आपको सम्मान प्राप्त नहीं हो रहा है तो बेशक आप ही सम्मान के योग्य काम नहीं कर रहे हो। और अगर बुढ़ापे में आपका सम्मान नहीं हो रहा है तो आपसे ही अपनी परवरिश में कोई त्रुटि हुई होगी, यह आपका ही कर्मफल है।उदाहरण के तौर पर, बड़े-बड़े शहरों में किन्नर यात्रियों से पैसे मांगते हैं, और ना देने पर यात्रियों के गुप्तांग को पकड़ लेते हैं, उन्हें चप्पल से मारते हैं, उनके सिर को अपने वस्त्रों के अन्दर घुसा देते हैं; क्या यह सम्मान जनक कार्य है ? जो सम्मानजनक कार्य करते ही नहीं है उन्हें सम्मान कैसे मिल सकता है और भला उन्हें क्यों मिलने चाहिए ?
समाज में ऐसे घृणित कर्म को करने वाले लोगों के लिए जगह नहीं होनी चाहिए। किसी से पैसे निकलवाने के लिए घृणित काम करने वाले लोग, चाहे वो रास्ते में जबरदस्ती करने वाले भिखारी हो, किन्नर हो, या धार्मिक ठेकेदार, ये समाज की गंदगी है जो समाज को दूषित करने का काम करते हैं और सामाजिक व्यवस्था को खराब करते हैं।
-AnAlone Krishna
16th May, 2024 A.D.
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