जिंदगी किनारे पर बँधी इस नाव की तरह होती है। जब तक रिश्तों के डोर के सहारे अपनों की नींव के साथ समाज रूपी किनारे से बँधी रहेगी, वह कभी अपने जीवन के उद्देश्य को पूरा नहीं कर सकती है। रिश्तों के डोर वो रुकावटें बन जातें हैं उसके लिए जो कुछ हासिल करने के लिए कभी आगे नहीं जाने देतें। फिर वही, जब बाढ़ आता है तो इन्हीं डोरों से बंधे होने के कारण नाव डूब भी जाया करतीं हैं।
हमें जन्म देने से लेकर, हमारा पालन-पोषण से हमारे व्यक्तित्व के विकाश तक जिन्होंने भी अपना जो योगदान दिया, उसके लिए हमें हमेशा उनकी कद्र करनी चाहिए। पर अगर उनके मोह के बंधन से हम मुक्त ना हो सके तो कभी अपने जीवन को सार्थक नहीं कर सकते हैं।सिर्फ रोज़गार, नौकरी, व्यवसाय से धनोपार्जन करना; सामाजिक रीति-रिवाजों के मद्देनजर फिर शादी करना और बच्चें पैदा करना और बस घर की जिम्मेदारियों में सिमट कर रह जाना; या अपनी शान में उपलब्धियाँ हासिल करना और जश्न में भोग-विलाश करना ही किसी के जीवन का एकमात्र उद्देश्य नहीं होता है। बल्कि जिस मानव समाज में रहते हैं, जहाँ हमें अपनों के साथ ख़ुशहाली से जीने का मौका मिलता है, हमारा उसके प्रति भी दायित्व होता है कि हम उस समाज को और बेहतर बनाने में अपना योगदान दें ताकि वो अभागे भी जिन्हें हमारी/आपकी तरह खुशहाली से जीवन जीने का शौभाग्य ना मिला हो, उनके साथ-साथ उनके भी आने वाली पीढ़ी आपकी युवापीढ़ी के साथ एक बेहतर समाज में अपना जीवन खुशहाली से बिता सके।
अगर अपने में या अपनों के डोर से किनारों पे बंधे रहोगे तो उनके लिए कब और कितना करने का अवसर मिलेगा !
-AnAlone Krishna.
25th August, 2022 A.D.
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