__________Day 15__________
Dear elders,
मैं आपको अपना ideal मानता था। आपको अपना मार्गदर्शक मानता था और आपका अनुशरण करना था। इसलिए मेरे मन में जो भी प्रश्न मेरी जिज्ञासा को बढ़ाते थे, मेरे मन मे संदेह उत्पन्न करते थे, में उन्हें बेहिचक पूछता था। ताकि मेरा संदेह दूर हो जाये और मेरा भरोसा हमेशा, हर situation में आप पर बनी रहे। मगर आपने मुझे अपने उत्तर से मुझे dissatisfy किया। अपने मुझे मेरे प्रश्न से भटकाने की कोशिश की। आपने मेरे प्रश्न का सीधा उत्तर नहीं दिया। आपके हाव-भाव बता रहे थे कि आपके पास मेरे प्रश्न का उत्तर होते हुए भी आपने मुझसे छुपाने की कोशिश की। आप बस मुझे उतना ही बताते हो जिससे आपका काम हो सके। आप बस मुझे उतना ही बताते हो जिससे मुझे संदेह ना हो और मैं आपका विद्रोह ना कर दूँ, ताकि मैं आँख मूँदकर आप पे भरोसा करके आपका अनुशरण करता रहूँ। मगर मुझे संदेह हो गया और मैं अब मैं विद्रोह कर रहा हूँ। जो सही है, जो सत्य है, उसे छुपाने की जरूरत नहीं। कोई सही का साथ नहीं छोड़ता। मगर आपने मुझसे धोखे में रखकर मेरा भरोसा तोड़ा है। इसलिए मैं अब आपका अनुशरण नहीं करूँगा। अब मैं आपसे कोई प्रश्न भी नहीं पूछूँगा। अब मैं अपने सवाल खुद ढूंढूंगा और अपने फैसले खुद लूँगा। अब मैं आप लोगों के बताए रास्तों पर नहीं चलूँगा। अब मैं अपने रास्ते खुद बनाऊँगा और अब मैं उन्ही रास्तो पर चलूँगा जो मुझे सही लगेगा। चाहे वो आप लोगों को सही लगे या ना लगे। चाहे वो आपको पसंद हो या ना हो। चाहे वह आप चाहे या ना चाहे।
मैं आप लोगों की बहुत इज्जत करता हूँ। पर फिर भी अब मैं वही करूँगा जो मुझे सही लगेगा। अब मैं वही करूँगा जो मैं चाहूँगा।
आपका अपना
Krishna Kunal
20 June, 2020 A.D.
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