भाग-७ • हमदर्द सा कोई • भाग-८
पद्य-१
("हमदर्द सा कोई" कृष्ण कुणाल द्वारा लिखा जा रहा साहित्यिक नमूना है, जिसका कुछ चुनिंदा भाग लेखक के facebook profile के photo album के रूप में uploaded है। इस श्रृंखला का पहला पद्य आपके सामने प्रस्तुत कर रहा हूँ।)
• हमदर्द सा कोई •
पद्य-१
हमें लगता था बस हम ही
दिल पर खाके वार बैठे है।
मगर यारों, मेरे जैसे
यहाँ तो हजार बैठे हैं।
हर कोई तड़पता हुआ दिल लेकर
बेदर्द जमाने को कहता हुआ,
अपने महबूब की यादों के साथ,
लगाकर यहाँ कतार बैठे हैं॥
अरे हम भी तो हैं उन्हीं मे से एक।
कमबख्त यह दिल मेरा हया ना करता-
औरों के जख्मों के बारे में बयां ना करता।
फिर हम भी तड़पते बस अपने ही गम में।
अगर दर्द अपना सा ना बताता यह दिल,
तो आँसुओं को पोंछने में मन मेरा समय जयां ना करता॥
अब यह एक तमन्ना
मेरी जिद पे अड़ी है-
थाम लूँ हाथ उन अजनबियों का
जिनकी जिंदगी में तनहाई आ खड़ी है।
जो ढूँढता फिर रहा था मैं
किसी को अपनी खलिश दूर करने को,
जिनकी जिंदगी आज उन्हें भी
बर्बाद करने पर पड़ी है॥
निशाना जो बनाऊँ उनकी भी जिंदगी में थोड़ी सी खलिश लाने को मैं।
वह कौन सा जरिया होगा उनके दिल पर थोड़ी सी जगह पाने का,
जिससे करूँ मैं कोशिश मुरझाये चेहरे पर हंसी लाने का।
आखिर कहता था मैं भी छोड़कर चले जाओ तनहाई में मुझको।
ना कहता था मैं भी क्या दर्द है मुझको,
ना देता था मौका मैं भी मेरे चेहरे पर खुशी लाने का॥
पर कुछ तो होगा तय आखिर
उस खुदा के मन में जरूर।
बन जाए एक दूसरे का
हम हमदर्द सा कोई या
बाँटने में दर्द एक दूसरे का
हो जाए आपस में ही मगरूर।
छोड़कर खुद को ही बस अपने
जैसा तन्हा समझने का गुरूर॥
• ऐसा मानना कि आपको या आपके problems को कोई नहीं समझ सकता, हमेशा सही नहीं हो सकता। एक बार कह कर देखिए, शायद कोई समझ जाए। या हो सकता है कि, आपके बस अपने problem को समझाते ही आप खुद ही इसका solution ढूंढ लें।
-AnAlone Krishna.
31st October, 2018 A.D.
॥ हमदर्द सा कोई ॥ भाग :- १ | २ | ३ | ४ | ५ | ६ | ७ | ८ | ९•० | ९•१ | ९•२ | १०.० | १०.१ | १०.२ | ११.० | ११.१ | ११.२ | १२
'हमदर्द सा कोई' is my ongoing literary work, whose 1st poem you would read now. For read uploaded parts of the stories, link to this album has given below-
https://m.facebook.com/an.alone.krishna/albums/1802405276671864/

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