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"Life की परछाई: Chapter 4Chapter 5Chapter 6Chapter 7 • Chapter 8 • Chapter 9" has published on 8th August, 2025. Page के सबसे अंत में UPI QR code लगा हुआ है, अगर आप मेरे काम को अपने इक्षा के अनुरूप राशि भेंट करके सराहना चाहते हो तो, आप उसे scan करके मुझे स्वेक्षित राशि भेंट कर सकते हो। जो आप वस्तु भेंट करोगे, वो शायद रखा रह जाए, परंतु राशि को मैं अपने जरूरत के अनुसार खर्च कर सकता हूँ। ध्यानवाद !
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Day 85 | Diary of AnAlone Krishna

 __________Day 85__________


जो अपनी पूरी उम्र गुजर देने के बाद भी लोग जहां रहते हैं वहां अपना friend circle नहीं बना पाते हैं,

इस तरह के माता-पिता अपने बच्चों पर बोझ बनते हैं। अगर दंपत्ति अपने बुजुर्गों का ख्याल कर कर रहेगा तो वह कमाएगा कब ? आजकल का जो work culture है, उन्हें जितना समय देना पड़ता है अपने काम, उसमें भी जितना कम salary मिलता है जिसके चलते दोनों couple को काम पे जाना पड़ता है। तो वह काम पे जाए या पीछे इन्हें देखे।

समस्या यह है कि सभी धार्मिक होने का ढोंग करते हैं, पर वो अपने धर्मग्रंथों को पढ़ते नहीं है, समझने का कोशिश नहीं करते हैं।
रामायण में जब श्री राम राजगद्दी पर बैठते है तो उनकी माताएं उनके गुरु के आश्रम चले जाते है। लव, कुश के बड़े होने के बाद राम के साथ चारों भाई अपना राजपथ त्याग देते हैं।
महाभारत में जब धृतराष्ट्र अपने तरीके से शासन करने लगता है तो उसकी दादी सत्यवती अपने पहले बेटे व्यास का आश्रम चली जाती है। जब पांडवों अपना अलग राज्य बसाने जाते हैं तो कुंती को हस्तिनापुर में ही रखा जाता है। ताकि पांडव अपने काम में focus कर सके। जब कुरुक्षेत्र के बाद पांडव हस्तिनापुर के सिंहासन पर बैठते हैं तो धृतराष्ट्र, गांधारी और कुंती वन में आश्रम चले जाते हैं, जहां बीच-बीच में पांडव उनसे मिलने जाते थे।

Core concept यह था कि
1. आश्रमों में ही ऋषि मुनियों के पास औषधि और उपचार का ज्ञान था। जिससे बुजुर्गों के उम्र के बाद अलग अलग तरह की बीमारियों का इलाज हो सके।
2. अपने वृद्धावस्था में बुजुर्ग संसार का मोह त्यागे और अपना मन अध्यात्म में लगाए और अपनी मृत्यु को स्वीकार करे। ताकि उनकी आत्माओं का उद्धार हो।
3. जो वयस्क थे उनका समय बुजुर्ग सेवा के चक्कर में खराब ना करे। वयस्क जो समाज के प्रति जिम्मेदारी लेता है, उसे वह पूरा कर सके।...

हर किसी को अपने friend circle में रहने में अपने हमउम्र के बीच रहने में ज्यादा मजा आता है। गांव में बूढ़े भले अलग अलग घर में रहते हो पर सुबह, दोपहर, शाम बूढ़े एक जगह मिलते हैं, गप्पे करते हैं, एक दूसरे का देखभाल भी करते हैं।
बस आजकल जो एकल सोच लोग मन में पालने लगे कि बस अपने आप से मतलब रखने वाला, इसके कारण बूढ़े बच्चों के बड़े हो जाने के बाद अकेले पड़ जाते हैं। वरना मैं चाहे कितनी भी सुविधाएं अपने मम्मी-पापा को दूं, मै जानता हूँ कि उनका मन वहां नहीं लगेगा। क्योंकि गांव में जहां वो अपनी पूरी जिंदगी गुजार दिए, वहां उनका बहुत बड़ा circle है। जिनसे वो मिलते हैं, बाते करते हैं, सुख दुख share करते हैं, और जिंदा(दिल से) रहते हैं।
जो इतने गए गुजरे हैं कि उनका किसी से नहीं बनता, उनका ही कोई circle नहीं बनता है। और उनका मोह अपने बच्चों से बहुत ज्यादा होता है, जिसके वजह से वो अपने बच्चों पर बोझ बनते हैं। और समझने वाली बात यह है कि जिनका किसी से भी नहीं बनता, वो अपने बच्चों के साथ कैसे बर्ताव करते होंगे। तो जाहिर सी बात है कि उनका अपने बच्चों और बहुओं से भी नहीं बनेगा, उनके बच्चों के बच्चों से भी नहीं बनेगा। तो वो यहां से वहां तो नाचते ही रहेंगे, या कोने में पड़े ही रहेंगे। क्योंकि संसार नियम से नहीं चलता है, भाव(मन का) से चलता है। आप जैसे अपने बच्चों के साथ और उनके सामने व्यवहार करोगे, वैसा ही तो वो सीखेंगे और आपके साथ भी व्यवहार करेंगे। रिश्तों को बंधनों में बांधने के विरोध में हर दार्शनिक कह कर गए है, फिर भी लोग यही करने में लगे है। जबकि सही तरीका यह होता है कि रिश्तों को अपने भाव, स्वभाव के संभाला जाता है।

सब बात इसपर निर्भर करता है कि कोई कितना चीजों को समझता है, कौन कितना सांसारिक बातों को समझता है, संसार और आत्मीयता को समझता है। इसके लिए अध्यात्म को समझना बहुत जरूरी है, मतलब कौन कितना आध्यात्मिक है। ध्यान रहे कि मैं आध्यात्मिक कहां हूं, धार्मिक नहीं। क्योंकि दोनों बातें same नहीं है।

-AnAlone Krishna
27 October, 2025 A.D.

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