मेरे अंदर बैठे शिव और मैं (कविता)

Thursday, December 26, 2024 0 Comments

 मेरे अंदर बैठे शिव और मैं

(कोई भी आत्मा ईश्वर को प्रतिस्पर्धा करके प्राप्त नहीं कर सकता है। ध्यान-योग-साधना मन की स्थिरता से पनपते हैं। विचलित मन में उसकी स्मृति कैसे समाएगी भला !)


मेरे अंदर बैठे शिव और मैं


हसदेव काट कर चुप रहने वाले लोग,

थैले भरकर तुलसी पूजा करते है।

सुबह शाम भजन कीर्तन होती नहीं जिनसे,

वो चर्च के आगे शोर शराबा करते हैं।

क्या फर्क पड़ता है अगर किसी का सांता खाना पहुंचा रहा हो तो,

खुद के शिव और कृष्ण को तो तमाशा बनने से रोक नहीं हैं पाते।

दिल पे बसने वाले राम शायद मन की भावनाओं को सुन नहीं पा रहे,

इसलिए प्रतिस्पर्धा में उनसे शोर शराबा करते है।



जो दिल में बैठे है उस राम से मैं,

बातें करता हूं,  उनके सामने शोर नहीं करता।

जो नैनों में बसे उस शिव को मैं,

उन विचलित लोगों की तरह कभी अनादर नहीं करता।

वो कहते है मुझको कि क्यों तड़पते हो कृष्ण ?

तुझमें भी हूं और उनमें भी तो मैं ही हूं।

खुद को बर्बाद करोगे तो हम कहां रहेंगे ?

हमें मूरतों में तो तुम पूजते हो,

हम तो तुम्हारे दिल में रहा करते हैं॥


-AnAlone Krishna.

26th December, 2024 A.D.


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