• मेरा सफरनामा (short story) • By AnAlone Krishna

Friday, June 21, 2019 0 Comments
• मेरा सफरनामा (short story) •
By AnAlone Krishna

• मेरा सफरनामा (short story) •
By AnAlone Krishna

पिछली बार जब मैं घर जा रहा था, तब मैंने 'हजारीबाग बस स्टैंड' से bus पकड़ा। मैं अक्सर वहीं से bus के जरिए घर जाया करता हूं। कोई त्योहार वगैरह का छूट्टी तो नहीं था, बस ऐसे ही घर जाने का मन था तो मैं जा रहा था। मैंने bus खुलने से 15min उसे पकड़ा हुआ था, इसलिए मुझे window seat आसानी से मिल गया। और कोई खास मौका ना होने के कारण मेरे बगल वाली seat खाली ही थी।

कुछ देर बाद बस रामगढ़ के लिए खुली ही थी कि एक लड़की दौड़ती हुई bus में चढ़ गई। वह मेरे बगल वाली seat पर आके बैठ गई। मैंने उसकी ओर देखा वो थोड़ा परेशान लग रही थी और उदास भी। मैंने पहले तो सोंचा कि उससे उसकी उदासी की वजह पूछूं। मैं अपना मुंह खोलेने ही वाला था कि ticket collecter आ गया। वह ticket काटकर चला गया। मेरे मन में यह बात घूम रहा था कि मैं उससे पूछूं या नहीं । फिर मैंने सोचा कि पूछ ही लेता हूं। शायद इसी बहाने जो उससे बातचीत शुरू होगी उससे कुछ देर के लिए ही सही, पर उसका ध्यान तो उसकी परेशानी से हटेगा। कुछ देर के लिए ही सही मगर वो अपनी परेशानी तो भूलेगी और शायद उसके चेहरे में इससे मुस्कान आ जाए। दरअसल यह मैं देखना चाहता था कि वो मुस्कुराते हुए कैसी लगेगी। मैं कुछ बोलने ही वाला था कि उसका call आ गया। वह बस इतना ही बोली, "हां आ रही हूं। बस में हूं।" मैंने देखा कि उसके आंखों का पानी बढ़ गया। और दो बूंद आंसू उसकी आंखों से छलक गए। जब मैंने यह देखा तो मेरे दिल से आह निकल गया। हालांकि अभी तक मैंने उसके सामने एक शब्द भी नहीं बोले थे। मैंने सोचा कि रोने के लिए उसका माथा अपने कंधे पर रख दूं। मैं हांथ उठाने ही वाला था कि bus अचानक रुका और मेरा माथा आगे की seat से टकरा गया। उसने मेरी ओर देखा। आगे से conductor आवाज़ दिया, "जल्दी कीजिए चच्चा।" एक बुजुर्ग व्यक्ति उतर रहे अपने साथी को आवाज दिया, "अगली बार भी मिलोगे ना।" उतर रहे व्यक्ति ने उतरते - उतरते जवाब दिया, "अगर भगवान ने चाहा तो जरूर।"

मुझे घंटी का आवाज सुनाई दिया। बाहर देखा तो बाहर शिव जी का मंदिर था। फिर कानों में यह बात दोबारा गूंजा,
"अगर भगवान ने चाहा तो..."
शायद उसका दिल हल्का करना, आंसू पोछना, सहारा देना, वो काम मेरा था ही नहीं। वो जगह शायद किसी और की थी। जब हम दुखी होते हैं और हमें अपनो से उम्मीदें होती है कि आके वो सहारा देंगे, हम तड़पते है जब तक कि वो हमें आके सहारा ना दें। लेकिन जिन्हें यह उम्मीद भी नहीं होती, वो तो ठीक से तड़प भी नहीं पाते। हमेशा उनका दर्द उनके सीने में दबा रहता है। सालों - साल तक। और इसे उनकी आंखो में देखा जा सकता है।

एक Anglo-Indian writer, Ruskin Bond का line है कि, "The strongest person of the world is he, who stands alone." खैर जाने दो, इस अहसास को जाने दो, तुम नहीं समझोगे।

-AnAlone Krishna.
21st June, 2019 A.D.
यह story काल्पनिक है। वास्तविकता से इसका कोई संबंध नहीं है।

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