*बता जरा, मैं फिर हूँ बहका*, कृष्ण कुणाल की लिखी कविता

Tuesday, December 05, 2017 1 Comments
*बता जरा, मैं फिर हूँ बहका*
(एक बार दिल टूटने के बाद फिर से किसी के पीछे बहकने लगने के एहसास में लिखा हुआ)
कृष्ण कुणाल की लिखी कविता-


*बता जरा, मैं फिर हूँ बहका*

ऐ महका-महका हवा,
ऐ रंग विरंगा समां.....,
बता जरा, तू क्यूँ है बहका....?
बता जरा, मैं फिर हूँ बहका..।।

यह कौन है ?
मेरे ख्वाबों वाली...!
यह कौन है ?
तेरे यादों वाली...!
मैं लूट रहा ।
तू छूट रहा ।।
मेरा दिल इसे देखकर,
है क्यूँ चहका ?

ऐ महका-महका हवा,
ऐ रंग विरंगा समां.....,
बता जरा, तू क्यूँ है बहका....?
बता जरा, मैं फिर हूँ बहका..।।

थे ख्वाब अधूरे,
जो अब हैं पूरे ।
है चहल पहल,
जो राह थे सूने ।
वो मंजिल अपनी,
है मेरे सामने।
जिसे नामुमकिन कभी,
बताया था तूने।।

ना मायूस रहा मैं,
ना उदास रहा तू ।
ना तनहा रहा मैं,
ना खामोश रहा तू ।
ना करना बचा,
तेरे साये का पीछा ।
फूल खिल रहा,
जो तूने सींचा ।।

ऐ महका-महका हवा,
ऐ रंग विरंगा समां.....,
बता जरा, तू क्यूँ है बहका....?
बता जरा, मैं फिर हूँ बहका..।।

है हुस्न ये उसका,
या ईश्वर की माया ।
जो चुभ रहा था ,
वो फिर है भाया ।
मेरा टूटा दिल था,
जो जुड़ रहा है ।
मेरा किस्मत था रूठा,
जो मुड़ रहा है ।।

क्या फिर वो चाहूँ ?
जो पा ना सका ।
क्या अब तू लायेगा ?
जो ला ना सका ।
उम्मीद जगा लूँ ?
जो टूट गए थे ।
क्या अब भाएगा ?
जो भा ना सका ।।

ऐ महका-महका हवा,
ऐ रंग विरंगा समां.....,
बता जरा, तू क्यूँ है बहका....?
बता जरा, मैं फिर हूँ बहका..।।

-AnAlone Krishna.
04-05/12/2017

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